Tuesday, September 6, 2016

सूर्यवंशी सम्राट हर्षवर्धन बैंस जिसने सबसे पहले राजपूत (राजपुत्र) उपाधि धारण की थी

सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट हर्षवर्धन बैंस ने बनवाया था इलाहबाद प्रयाग का किला,
पर इसका श्रेय मिलता है अकबर को!!!!

इन्ही सम्राट हर्षवर्धन बैंस शिलादित्य ने सबसे राजपुत्र उपाधि ग्रहण की थी,जो कालांतर में सभी क्षत्रिय राजकुमारों द्वारा प्रयुक्त की जाने लगी और यह राजपुत्र शब्द क्षत्रिय वर्ण का पर्यायवाची हो गया,
राजस्थान में यही राजपुत्र भाषा के अपभ्रंश के चलते राजपूत हो गया,
और दसवी सदी के पश्चचात् राजपूत समस्त क्षत्रियो के लिए प्रयुक्त होने लगा।।

सम्राट हर्षवर्धन बैंस के वंशज बैस राजपूत कन्नौज के आगे बढ़कर अवध पूर्वांचल बिहार मध्य भारत तक फ़ैल गए,अवध में इनकी बैसवारा नाम से बहुत बड़ी बस्ती है।।

जो बैंस राजपूत थानेश्वर और पंजाब क्षेत्र में ही रह गए वो शनै शनै पंजाब जम्मू कश्मीर में फ़ैल गए,
पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर क्षेत्र और आज के पाकिस्तानी पंजाब क्षेत्र में बैस राजपूत मुसलमान बन गए थे और वहां बड़ी मात्रा में मिलते हैं

जम्मू में कई गांव हिन्दू बैस राजपूतो के मिलते हैं
कुछ हिन्दू बैस राजपूत हिमाचल और पंजाब में भी हैं पर पंजाब हरियाणा के अधिकांश बैंस राजपूत बाद में जाट महिलाओ से विवाह करके जाट जाति में मिल गए और पंजाब के सिक्खो में मिलते हैं
हालाँकि ब्रिटिश गजेटियरो में बैंस जाटों ने खुद को जंजुआ राजपूतो की संतान बताया था,

सूर्यवंशी राजपूत सम्राट हर्षवर्धन बैस को नमन
जय राजपूताना  

मेरठ-सहारनपुर मण्डल में सपा बसपा कांग्रेस ने दिखाया राजपूतो को ठेंगा

आगामी विधानसभा चुनावो में वेस्ट यूपी के सहारनपुर, शामली,मेरठ, बागपत,मुजफ्फरनगर जिलों से विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा राजपूतो को दी जाने वाली संभावित उम्मीदवारी का विवरण निम्न प्रकार है

1--सहारनपुर जिला----
कुल विधानसभा सीट--07
बीजेपी के संभावित राजपूत उम्मीदवार--02(देवबन्द,बेहट)
सपा से संभावित उम्मीदवार--शून्य(देवबन्द से श्रीमति मीणा राणा की बजाय गुर्जर उम्मीदवार की चर्चा)
बसपा से राजपूत उम्मीदवार--शून्य
कांग्रेस से राजपूत उम्मीदवार---शून्य
राष्ट्रीय लोकदल से राजपूत उम्मीदवार--शून्य

2--मुजफ्फरनगर-शामली जिला----
कुल विधानसभा सीट--09
बीजेपी के संभावित राजपूत उम्मीदवार--01(थानाभवन)
सपा से संभावित उम्मीदवार--शून्य
बसपा से राजपूत उम्मीदवार--शून्य
कांग्रेस से राजपूत उम्मीदवार---शून्य
राष्ट्रीय लोकदल से राजपूत उम्मीदवार--शून्य

3--मेरठ-बागपत जिला ---
कुल विधानसभा सीट--09
बीजेपी के संभावित राजपूत उम्मीदवार--01(सरधना)
सपा से संभावित उम्मीदवार--शून्य
बसपा से राजपूत उम्मीदवार--शून्य
कांग्रेस से राजपूत उम्मीदवार---शून्य
राष्ट्रीय लोकदल से राजपूत उम्मीदवार--शून्य

तो वेस्ट यूपी के इन 5 जिलों में जो एक दूसरे से जुड़े हैं उनकी कुल 25 सीट में बीजेपी राजपूतो को 04 टिकट दे रही हैं,
वहीँ सपा बसपा कांग्रेस रालोद ढेंगा दिखा रही हैं

इन 5 जिलों के राजपूत किस दल को वोट करें???????
सभी जवाब जरूर दें,

जिन स्वर्गीय राजेन्द्र राणा ने 2003 में बसपा के 40 विधायक तोड़कर मुलायम सिंह की सरकार बनवाई थी,और 2012 में उन्होंने देवबन्द सीट अपने दम पर जीतकर सपा की सहारनपुर जिले में लाज बचाई थी,
उनकी असमय दुखद मृत्यु के बाद सपा उनकी पत्नी श्रीमती मीना राणा का टिकट काटकर क्या सन्देश देना चाहती है????

Saturday, September 3, 2016

स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह न्यांगली,एक जांबाज क्षत्रिय यौद्धा


जय हो,
आज चुरू राजस्थान के क्षत्रिय शेर स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह (राठौर) न्यांगली को आंशिक न्याय मिला है,
06 फ़रवरी 2009 में प्रतिद्वन्दी जाट गिरोह ने धोखे से इनको अकेला पाकर हत्या कर दी थी,जिससे सारे राजस्थान में आग जल उठी थी,

आज जिला व सेशन न्यायाधीश ने इस मामले में श्यामसुन्दर उर्फ सुन्दरिया व सतपाल को धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

लेकिन पुलिस की लचर विवेचना और कमजोर पैरवी से इस
मामले मे 4 अन्य अपराधियो को बरी कर दिया गया है।।

चुरू नागौर सीकर झुंझनू शेखावाटी राजस्थान का वो इलाका है जहाँ जाट कुल आबादी में 25% से 35% के बीच है वहीँ राजपूत यहाँ 6% से 8% के बीच है,
स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले इस पुरे इलाके पर राजपूत जमीदारो का जबरदस्त वर्चस्व था,
किन्तु 1947 के बाद सब कुछ बदल गया ,गधे घोड़े एक श्रेणी में आ गये और लोकतन्त्र भीड़तंत्र के रूप में सामने आया,

इसी भीड़ के मामले में बहुत आगे होने का फायदा उठाकर पहले जाटों ने राजनीति में अपना वर्चस्व जमाया वहीँ बाद में प्रशासन और दबंगई में भी वर्चस्व जमा लिया।।

जाट वर्चस्व स्थापित होते ही चुरू नागौर इलाके में जाटों ने अन्य जातियो को सताना शुरू कर दिया और इन नवसामन्तवादियों ने इस इलाके में हर वो जुल्म किये जिनका आरोप ये पहले राजपूतो पर लगाते थे,

जब इनके अत्याचार और मनमानी चरम पर पहुंच गयी तो जिन शेरदिल राजपूतों ने इन्हें इन्ही की भाषा में मुहतोड़ जवाब दिया उनमे अग्रणी थे स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह न्यांगली जी.....

वीरेंद्र सिंह ने कुछ जांबाज राजपूतो के साथ मिलकर इन्हें ऐसी मार लगाई कि इन्हें छुपने को भी जगह ढूंढनी मुश्किल हो गयी,
इस दौरान राजपूत और जाट शराब माफियाओ में जमकर गैंगवार हुई जिनमे राजपूतो का नेतृत्व स्वर्गीय विरेंद्र सिंह न्यांगली ने किया।।
गैंगवार में जाट सरगना सुमेर फगेडिया मारा गया और उसके बाद जाट गिरोह की कमान संभालने वाले विजेंदर टिलिया पर भी जानलेवा हमला हुआ जिसमे वो अपनी आँख गंवा बैठा।।

कुछ दिन बाद जाट गैंग के दारासिंह की चर्चित पुलिस एनकाउंटर में मौत होने पर जाटों ने मंत्री राजेन्द्र राठौर और वीरेंद्र सिंह न्यांगली की मिलीभगत का आरोप लगाया।

वीरेंद्र सिंह ने बसपा में शामिल होकर जाट बाहुल्य क्षेत्र से विधानसभा चुनाव भी लड़ा था और बेहद मामूली अंतर् से हार गए थे।।

लेकिन 06 फ़रवरी 2009 में वीरेंद्र सिंह को अकेला पाकर जाट गिरोह ने गोलियां बरसाकर उनकी हत्या कर दी,
जिससे पुरे राजस्थान में आग लग गयी थी।।

इस हत्याकांड से राजपूत पक्ष कमजोर पड़ गया लेकिन अब आनन्दपाल सिंह पटल पर सामने आया जिसने जाटों को फिर से बैकफुट पर ला दिया।

2013 में उनके भाई मनोजसिंह न्यांगली सादुलपुर से जाट उम्मीदवार को हराकर विधायक बने और अपने स्वर्गीय भाई का सपना पूरा किया।
उनपर भी जाट जानलेवा हमला कर चुके है और अभी भी वो जाटों के निशाने पर हैं।।
वो विधायक रहते हुए जज की परीक्षा पास कर चुके हैं पर उन्होंने जज की नोकरी के बजाय समाजसेवा करने का निर्णय लिया है।राजस्थान विधानसभा में राजपूत आरक्षण की सबसे जोरदार मांग मनोज सिंह ने ही उठाई और चुतरसिंह हत्याकांड में भी इन्होंने जमकर बिरोध किया।

आज स्वर्गीय वीरेंद्र सिंह को आंशिक न्याय मिला है लेकिन नवसामन्तवाद के विरुद्ध सर्वसमाज की जंग में वो हमेशा आदर्श बने रहेंगे,
जब जब समाज में अनीति जुल्म अत्याचार बढेंगे तो कोई न कोई शेरसिंह राणा,वीरेंद्र सिंह न्यांगली जन्म जरूर लेगा।।

🙏🏻🚩वीर वीरेंदर न्यांगली अमर अमर रहे 🙏🏻🚩

भाई तू शेर था, शेर बनकर जिया।।
गीदड़ तो वो थे जिन्होंने झुण्ड में।।
तेरे पे हमला किया।।।।
जय भवानी

राजपूताने के क्षत्रिय शेर देवीसिंह भाटी जिसने समाजहित में सर्वस्व न्यौछावर कर दिया

राजस्थान के क्षत्रिय शेर देवीसिंह भाटी----

देवीसिंह भाटी राजस्थान के राजपूत नेताओं में उन गिने चुने नामो में एक हैं जिन्होंने राजपूत कौम की भलाई के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया,
देवीसिंह भाटी जमीन से जुड़े हुए नेता है और धरतीपुत्र कहे जाते हैं,राजपूत आरक्षण के लिए जितनी जोरदार लड़ाई उन्होंने लड़ी उसने पुरे देश को हिला दिया था,
अगर समाज के गद्दार विश्वासघात न करते तो 2003 में राजपूतो को आरक्षण मिल गया होता और उसके बाद देशभर में राजपूत समाज को आरक्षण का लाभ मिलता,जिससे लाखो युवा बेरोजगार होने से बच जाते।।

जन्म और राजनीति की शुरुवात---
आपका जन्म 31 मई 1945 को हुआ था,
आप 1980 में पहली बार कोलायत विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और लगातार 33 साल विधायक रहे,
कई बार भैरोसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री भी रहे,ये जनता पार्टी,जनता दल,बीजेपी और निर्दलीय लगातार जीतते रहे।
पर कभी स्वाभिमान से समझोता नही किया।
उनके पुत्र महेंद्र सिंह भाटी 1996 में बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद चुने गए थे,

किन्तु उसके बाद इनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब 1998 में विधानसभा चुनाव के तुरन्त बाद इनकी पत्नी और छोटे पुत्र रविन्द्र सिंह की सड़क दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गयी।।

एक समय देवीसिंह भाटी जी भैरोसिंह शेखावत के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे,
वो उस समय राजस्थान में सबसे दबंग और लोकप्रिय राजपूत नेता थे,

लेकिन उन्होंने निज स्वार्थ की राजनीती करने की बजाय राजपूत समाज के मान सम्मान और उन्नति की लड़ाई लड़ी,और अपना राजनैतिक कैरियर दांव पर लगा दिया।

जाटों को वाजपेयी/वसुंधरा द्वारा ओबीसी आरक्षण----
अक्टूबर 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा वोटबैंक की गन्दी राजनीति के चलते जाटों को भी ओबीसी आरक्षण दे दिया गया था ,जिससे जाटों ने सारा मूल ओबीसी कोटा अकेले ही चट कर दिया और मूल ओबीसी जातियों का सरकारी भर्तियो में सफाया हो गया,
ओबीसी आरक्षण के दम पर जाटों ने पंचायत/स्थानीय निकाय के प्रधान/सरपंच/जिला प्रमुख पदों का बड़ा हिस्सा कब्जा लिया।

तब स्वर्णो और मूल ओबीसी के हको की लड़ाई लड़ने को देवीसिंह भाटी ने सामाजिक न्याय समिति बनाकर उपेक्षित को आरक्षण व् आरक्षित को संरक्षण का नारा दिया और बड़ी रैलियां आयोजित की।
उन्होंने राजपूतो को भी आरक्षण दिलाने को जोरदार लड़ाई लड़ी।।जिसने सरकार को हिला दिया,

इस सम्बन्ध में अमरूदों का बाग़ जयपुर में आयोजित एक रैली में 5 लाख राजपूतो ने भाग लिया और प्रदेश सरकार हिल गयी,बीजेपी सरकार ने मजबूरी में राजपूतो को भी 27% ओबीसी कोटे में शामिल करने  की तयारी कर ली,
लेकिन तभी राजस्थान में वसुंधरा की बीजेपी सरकार ने कुछ गद्दार राजपूतों को पद का लालच दिखाकर अपनी ओर मिला लिया,

तब प्रताप फाउंडेशन जैसे संगठनो,राजेन्द्र सिंह राठौर,भवानी सिंह राजावत,लोकेन्द्र कालवी ,जैसे कई नेताओं ने उस दिन जो आचरण किया और उसके जो परिणाम राजपूतो के लिये हुए वो खानवा के युद्ध में बाबर के हाथो राणा सांगा की हार से भी ज्यादा भयानक थे!!!😢😢

नतीजा--------
राजपूत आरक्षण आंदोलन फ्लॉप हो गया,
और इसके साथ ही देवी सिंह भाटी की राजनीती चौपट हो गयी।।।

अमरूदों का बाग़ की विनाशकारी रैली के बाद ही 2003 में देवी सिंह भाटी को निजी आघात ऐसा लगा कि वो बिलकुल टूट गए,
उनकी पत्नी और छोटे पुत्र रविन्द्र सिंह की तरह ही उनके पुत्र पूर्व सांसद महेंद्र सिंह भाटी जी का भी एक संदिग्ध सड़क दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया!!!!!!!

इस आघात ने उन्हें तोड़कर रख दिया उसके बाद वो उबर नही पाए,महेंद्र सिंह के पुत्र आयुष्मान सिंह भाटी अब युवा हो गए हैं और अपने दादा देवीसिंह भाटी जी से राजनीती/समाजसेवा के गुर सीख रहे हैं

यह क्षत्रिय शेर अब बुजुर्ग हो गए हैं लेकिन समय समय पर अपने तेवर दिखाकर सरकार को झुकाने और अपने क्षेत्र/समर्थको की लड़ाई लड़ने में पूर्ण सक्षम हैं।

काश राजपूत समाज में चन्द गद्दार न होते????
काश पुरे राजपूत समाज ने उस समय देवीसिंह भाटी का साथ दिया होता!!!!!

अमरूदों का बाग़ की रैली के गद्दार आज भी राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनो में बड़े पदों पर बैठकर समाज को धोखा दे रहे हैं ,
हाल ही में चतरसिंह हत्याकांड मुद्दे पर भी इन्ही काली भेड़ो ने वसुंधरा सरकार का दलाल बनकर समाज के आंदोलन को कुचलने का कुचक्र रचा है।।

इन्ही काली भेड़ो ने जोधा अकबर के मुद्दे पर भी समाज को धोखा दिया था,
इन्होंने ही राजपूत आरक्षण आंदोलन की धार को कुंद किया और खुद के ही बनाए करणी सेना नाम के संगठन को बर्बाद कर दिया।।

और यही काली भेड़ें हाल ही में समाज से बहिष्कृत महल की स्वार्थ की लड़ाई में उनका साथ देती दिखाई दी,क्योंकि उससे इनके भी स्वार्थ जुड़े थे वहीँ लाङनु में गरीब राजपूत घर की बेटी नीतू राठौर ,
जिसने जाट छात्रो और अध्यापक के उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी ,
उसका परिवार आज भी न्याय की बाट जौह रहा है क्योंकि राजपूत संगठन महल की लड़ाई लड़ने में व्यस्त है !!!!!

काश राजस्थान में कुछ और देवीसिंह भाटी होते!!!!!!!

Friday, September 2, 2016

जब ठाकुर विजयपाल सिंह ने हरा दिया था चौधरी चरणसिंह को



मुजफ्फरनगर शामली जिले की राजनीति में राजपूतों की भूमिका---

आज मुजफ्फरनगर शामली की राजनीति में राजपूत समाज हाशिए पर है,जनपद में मुस्लिम, जाट, गुर्जरो का वर्चस्व है इनके बाद सैनियों का नम्बर आता है
कभी ताकतवर रहे त्यागी समाज की भी कोई विशेष भूमिका अब दिखाई नही देती,

किन्तु राजपूत समाज एक समय जनपद मुजफ्फरनगर शामली की राजनीति में अग्रणी भूमिका में था,जिसपर आज विश्वास करना मुश्किल है,

आप खुद राजपूतो की घटती हुई शक्ति पर नजर डालिये-----

1--1952 व् 1957 में कोई राजपूत या गुज्जर न सांसद बन पाया न ही कोई विधायक बन पाया,सांसद की 2 सीटों पर ब्राह्मण बनियो मुस्लिमो का वर्चस्व रहा,वहीँ इन वर्षो में 2-2 जाट विधायक विधानसभा पहुंचे।

2--1962 में राजपूतों ने जोरदार प्रदर्शन किया,

A--1962 में जाट मुस्लिम गुज्जर बाहुल्य कैराना लोकसभा सीट से ठाकुर यशपाल सिंह (पनियाला रुड़की निवासी) ने निर्दलीय चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया,

B--1962 में ही जाट बाहुल्य बुढ़ाना विधानसभा सीट से ठाकुर विजयपाल सिंह कछवाह ने सीपीआई के टिकट पर जीत हासिल की।

वहीँ थानाभवन विधानसभा सीट से कांग्रेस के ठाकुर रामचन्द्र सिंह पुण्डीर ने जीत हासिल की।

इस वर्ष भी कोई जाट गुज्जर लोकसभा नही पहुंच पाए, गुज्जर विधानसभा इस बार भी नही जा पाए,वहीँ 2 जाट विधायक जीते,
इस प्रकार 1962 में मुजफ्फरनगर शामली जिले में राजपूतों का वर्चस्व रहा।

3--1967 में लोकसभा की दोनों सीट मुस्लिम जीते,
वहीँ थानाभवन विधानसभा सीट से ठाकुर रामचन्द्र सिंह पुण्डीर दोबारा विजयी हुए,
इस वर्ष भी कोई गुर्जर विधानसभा में नही पहुंच पाया,वहीँ 2 जाट विधायक चुने गए।।

4--1969 में मध्यावधि चुनाव हुए जिनमे सभी विधानसभा सीट चौधरी चरण सिंह की बीकेडी ने जीती,कोई राजपूत विधायक नही बन पाया,
थानाभवन से मुस्लिम राजपूत विधायक बना,
वहीँ पहली बार गुज्जर विधायक जीत पाया,2 जाट भी विधायक बने।

5--1971 में राजपूतों ने इतिहास रच दिया,जब ठाकुर विजयपाल सिंह कछवाह (बिराल) ने जाट बाहुल्य मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से चौधरी चरण सिंह जैसे राष्ट्रीय नेता को हरा दिया,इस हार की टीस अभी तक जाट नेताओं में है।

6--1974 विधानसभा चुनाव में राजपूतो ने वापसी की,
जाट गुज्जर बाहुल्य सीट कांधला से ठाकुर मूलचन्द (bkd)और थानाभवन सीट से ठाकुर मलखान सिंह (कांग्रेस)विधायक बने

वहीँ इस बार 2 जाट और 2 गुज्जर विधायक भी बने।

7--1977 में लोकसभा चुनाव में पहली बार कोई जाट सांसद बन पाया।इसके बाद मुजफ्फरनगर शामली में सांसद की दोनों सीटो पर मुस्लिम और जाटों का एकाधिकार सा हो गया।

1977 विधानसभा चुनाव में थानाभवन सीट पर ठाकुर मूलचन्द जनता पार्टी से विधायक बने,
जबकि 2 गुज्जर और 2 जाट भी विधायक बने,
इस प्रकार जाट गुज्जरों के वर्चस्व की शुरुवात इसी चुनाव से हुई।

8--1980 में लोकसभा की 1 सीट व् विधानसभा की 1 सीट पर जाट विजयी हुआ,वहीँ 2 विधायक गुज्जर बने,

इसी चुनाव में जाटों के बेहद मजबूत गढ़ बघरा विधानसभा सीट से बाहुबली ठाकुर नकली सिंह पुण्डीर (भमेला निवासी) जीत गए,आज तक इस सीट से इकलौते गैर जाट विधायक यही हैं

9--1984 व् 1985 में कोई राजपूत न विधायक न ही सांसद बन पाया,
जाट समाज से 1 सांसद और 2 विधायक जाट, व् 2 गुज्जर विधायक बने।।

10--1989 में जनता दल की लहर में ठाकुर नकली सिंह पुण्डीर थानाभवन विधानसभा सीट से जीते,

वहीँ 2 जाट और 1 गुज्जर विधायक बने,1 सांसद भी जाट जीते।।

11--1991 में लोकसभा की दोनों सीट पर जाट जीते,वहीँ विधानसभा में भी 2 जाट और 2 गुज्जर जीते,

राजपूतो का इस चुनाव में सफाया हो गया।

12-- 1993 में 3 जाट और 1 गुज्जर विधायक बना,
जबकि थानाभवन सीट से ठाकुर जगत सिंह चौहान (चौसाना) बीजेपी से विधायक बने।।

13--1996 में 1 सांसद और 1 विधायक जाट समाज से जीता ,वहीँ 3 गुज्जरों ने जीतकर जाटों को सोचने को मजबूर कर दिया,पहली बार 1 सैनी भी विधायक बना,

इस चुनाव में कोई राजपूत नही जीत पाया,लेकिन बाद में थानाभवन सीट पर हुए उपचुनाव में ठाकुर जगत सिंह ने सपा के टिकट पर जीत हासिल की।

बस इसके बाद जनपद मुजफ्फरनगर शामली की राजनीति में राजपुतो का महत्व लगभग समाप्त सा हो गया।

लगभग डेढ़ दशक तक कोई राजपूत यहाँ से विधायक नही बन पाया,
2012 में फिर से बीजेपी के टिकट पर लोकप्रिय नेता ठाकुर सुरेश राणा ने बेहद मामूली अंतर से थानाभवन सीट से विजय हासिल की,

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर मेरठ की सरधना विधानसभा जोड़ देने से इस सीट पर राजपूत मत लगभग डेढ़ लाख हो गए हैं जो मुसलमानो दलितों और जाटों के बाद चौथे नम्बर पर हैं तो भविष्य में इस लोकसभा सीट पर राजपूतो को नजर रखने की आवश्यकता है,

इस प्रकार हम देखते हैं कि जाट मुस्लिम गुज्जर बाहुल्य मुजफ्फरनगर शामली जिले में राजपूतो की कम जनसँख्या के बावजूद राजपूत अपने जुझारूपन से राजनीति में स्थान बनाए रहे,

यहाँ राजपूत जाट बाहुल्य कांधला बुढ़ाना बघरा सीटो से विधायक भी बने और थानाभवन विधानसभा सीट पर वर्चस्व बनाए रखा,

लोकसभा में भी बेहद कम वोट के बावजूद दोनों सीटो पर राजपूतो ने अपने दम पर जीत हासिल की।।

अब पुन यहाँ के राजपूतो को एकजुट होकर राजनीति में अपना स्थान बनाए रखने के प्रयास बेहद आवश्यक है

सर्वश्रद्धेय ठाकुर विजयपाल सिंह कच्छवाह,ठाकुर यशपाल सिंह ,ठाकुर रामचन्द्र सिंह पुण्डीर, ठाकुर नकली सिंह पुण्डीर, ठाकुर मूलचन्द जी को शत शत नमन

संजय लीला भंसाली को सबक सिखाने के मूड में देशभर का राजपूत समाज

----------जय भवानी,खुशखबरी-------------
राजपूत समाज संजय लीला भंसाली को सिखाएगा सबक,

संजय लीला भंसाली द्वारा अपनी आने वाली मूवी में वीरांगना महारानी पदमावती का गलत चित्रण के मुद्दे पर मेवाड़ राजघराने की चुप्पी पर हमने अपना विरोध दर्ज करवाया गया था,
हमारा यह विरोध हुकुम Kunwar Sandeep Singh Tanwar जी द्वारा मेवाड़ के राजपूत संगठनो और राजपरिवार तक भी पहुंचा दिया गया है 👊👊👊👊
और उन्हें बताया गया कि इस मुद्दे पर राजपरिवार की चुप्पी से पुरे देश के राजपूत युवाओं में आक्रोश है,

संदीप तंवर जी ने बताया है कि मेवाड़ राजपूत समाज इस मुद्दे पर बहुत जल्दी इसी सप्ताह लीगल नोटिस संजय लीला भंसाली को भेज रहा है, मेवाड़ राजपरिवार भी अब इसमें क़ानूनी कार्यवाही की तैयारी में है,
इस सम्बन्ध में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सीपी जोशी से भी बात की गयी है,सभी ने एक स्वर से कहा है कि इतिहास से छेड़छाड़ बिलकुल नही होने दी जाएगी,

आदरणीय संदीप तंवर जी द्वारा हमे थोडा संयम रखने और राजपरिवार के प्रति कटु शब्द इस्तेमाल न करने की बात कही है जिसे हम स्वीकार करते हैं और पूर्व में इस्तेमाल किये गए किसी भी कटु शब्द पर खेद व्यक्त करते हैं,
जो भी राजघराने क्षत्रिय परम्परा पर चलते रहेंगे और क्षत्रिय समाज के संघर्ष में साथ होंगे उनका सदैव सम्मान था,सम्मान है और सम्मान रहेगा 💐💐

संदीप तंवर जी के प्रयास और मेवाड़ के राजपूत समाज/सर्वसमाज और मेवाड़ राजपरिवार के इस प्रयास को दिल की गहराइयो से नमन💐??

जय भवानी----
#धीर_सिंह_पुण्डीर की वॉल से साभार

क्या प्रायोजित सर्वे से योगी आदित्यनाथ का रास्ता रोकने कि साजिश हो रही है बीजेपी में ??

मित्रों हाल में  एबीपी न्यूज़ पर यूपी विधानसभा चुनाव का जो सर्वे दिखाया वो किसी खास उद्देश्य को लेकर प्रायोजित था और वो उद्देश्य था योगी आदित्यनाथ को बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से रोकना👎👎👎👎
सर्वे में अंतिम अनुमान के अनुसार इस समय समाजवादी पार्टी को पहले स्थान पर दिखाया गया है जो सही है,लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए पसन्द व विभिन्न सामाजिक वर्गों की संख्या और उनके रुझानों में दावे निराधार है,
सर्वे के विभिन्न बिंदुओं से मेरी सहमति/असहमति निम्न प्रकार है।
1--मुख्यमंत्री पद के लिए योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता जान बूझकर कमतर दिखाई गयी है,भले ही बीजेपी ने अभी किसी को इस पद के लिए प्रोजेक्ट न किया हो,
अखिलेश यादव और मायावती को 24-24% मतदाताओ की पहली पसन्द बताया गया है जो उनके समर्थक वर्गों के अनुसार सही है।।
लेकिन शेष 52% मतदाताओं में कम से कम से कम 30% की पहली पसन्द योगी आदित्यनाथ हैं
इस प्रायोजित सर्वे में योगी को कमतर दिखाने हेतु बीजेपी के कुछ नेताओं का हाथ भी अवश्य होगा।।
2--सर्वे में यूपी में स्वर्ण हिन्दू मतदाताओं की संख्या मात्र 18% बताई गयी जबकि यूपी में स्वर्ण हिंदुओं की कुल संख्या 24% से कम कदापि नही हैं जिनमे 9% ब्राह्मण, 8% राजपूत,
5% वैश्य,जैन,कायस्थ,खत्री,पंजाबी,सिंधी,सिक्ख आदि,2% त्यागी,भूमिहार व् अन्य स्वर्ण हैं।
सर्वे में मात्र स्वर्णो का 55% बीजेपी के समर्थन में बताया गया,
जबकि स्वर्णो का न्यूनतम 70% समर्थन इस समय बीजेपी के साथ है,यह आगे और भी बढ़ सकता है,हाँ व्यापारी वर्ग खुश नही है और कांग्रेस भी ब्राह्मणों पर डोरे डाल रही है।।
स्वर्णो के 24% वोट में-----
बीजेपी--14%
सपा--4%
कांग्रेस--4%
बसपा--2%
------------------------------------------------------
अहीर वोट----कुल 9%
सर्वे में अहीरों का मात्र 68% समर्थन सपा के लिए दिखाया गया है जबकि 80% अहीर सपा के साथ हैं,अहीरों को सपा शासन में जमकर उपकृत किया गया इसलिए सबल अहीर मतदाता खुलकर सपा के साथ है।।
अहीर वोट 9% में मेरे अनुमान से-----
बीजेपी--1%
सपा--7.5%
कांग्रेस--
बसपा--0.5%
------------------------------------------------
गैर अहीर ओबीसी--27% (जबकि सर्वे में इन्हें 33% दिखाया गया)
सर्वे में गैर अहीर ओबीसी का मात्र 38% बीजेपी, 23% बसपा और 19% सपा के साथ दिखाए गए,
जबकि अति पिछड़ी जातियां लगभग एकतरफा बीजेपी के पक्ष में हैं इस वर्ग में जाट गूजर कुर्मी जैसे सबल वर्ग ही खुलकर बीजेपी के साथ नही हैं जबकि मुराव काछी माली सैनी खुलकर बीजेपी के साथ है
गैर अहीर ओबीसी में 27% में-------
बीजेपी--13%
सपा--6%
कांग्रेस--2%
बसपा--6%
-------------------------------------------------------------
जाटव वोट 15%------
सर्वे में 75% जाटव वोट बसपा के पक्ष में दिखाया है जबकि यह वर्ग बहुत उग्रता से खुलकर बसपा के साथ है यह आंकड़ा 90% होगा,इनका मत प्रतिशत भी जबरदस्त होगा।इस वर्ग को बसपा सरकारो में जमकर उपकृत किया गया,इसलिए यह वर्ग खुलकर बसपा के साथ है
जाटव वोट 15% में---
बीजेपी--1%
सपा--0.5%
कांग्रेस--0.5%
बसपा--13%
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गैर जाटव दलित/जनजाति----6%
सर्वे में गैर जाटव दलित मतों में भी बसपा की बढ़त दिखाई गयी जो गलत है गैर जाटव दलितों का अधिकांश मत बीजेपी के साथ हमेशा से रहा है
गैर जाटव दलित/जनजाति वर्ग 6% में----
बीजेपी--3%
सपा--1%
कांग्रेस--0.5%
बसपा--1.5%
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मुस्लिम वोट---19%
सर्वे में मुस्लिम मतो का 4% बीजेपी को दिखाया जो एकदम गलत है, 0.5% भी बीजेपी के साथ नही है
62% मुस्लिम सपा के साथ दिखाए गए और 18% बसपा के साथ,
जबकि बसपा ने 130 टिकट मुस्लिमो को दिए हैं तो बसपा के लिए मुस्लिम का समर्थन बढ़ भी सकता है
मुस्लिमो के 19% में------
बीजेपी--0.5%
सपा--11%
कांग्रेस--2%
बसपा--5.5%
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इस प्रकार कुल आंकड़ा इस प्रकार होगा
बीजेपी----33.5%
सपा----30%
कांग्रेस---8%
बसपा--28.5%
लेकिन इस आंकड़े में एक पेंच यह कि जाटव अहीर और मुस्लिम मतो का मतदान प्रतिशत बहुत जबरदस्त होता है जबकि बीजेपी समर्थको का मतदान प्रतिशत कम रहता है
इसके अलावा निर्दलीय भी जरूर वोट काटेंगे तो इन सब समीकरणों को ध्यान में रखते हुए संशोधित आंकड़ा यह होगा।।
बीजेपी--31%
सपा--30%
कांग्रेस--8%
बसपा--28%
अन्य--3%
इन आंकड़ो से सीटो का अनुमान 
बीजेपी--130--140 
सपा---120--130
कांग्रेस--20--25
बसपा--100--110
निर्दलीय व् अन्य--5--7
इस प्रकार अभी किसी दल को बहुमत नही मिल रहा है,न ही कोई गठबंधन बनता दिख रहा है।।
बीजेपी अगर योगी आदित्यनाथ को सीएम उम्मीदवार बनाती है तो बीजेपी समर्थको का मतदान प्रतिशत बढ़ेगा और ध्रुवीकरण से बीजेपी की 40-50 सीट और बढ़ सकती हैं,और बीजेपी सरकार बनाने के नजदीक पहुंच सकती है।।
सपा को स्वर्ण हिन्दू विशेस्कर ठाकुर वोट तभी अतिरिक्त मिल पाएगा जब बीजेपी सीएम उम्मीदवार के लिए गलत निर्णय लेती है उस स्थिति में सपा की अतिरिक्त 25 अधिकतम सीट और बढ़ सकती हैं इस स्थिति में सपा कांग्रेस और निर्दलीय मिलकर जादुई आंकड़े तक पहुंच सकते हैं
बसपा के पक्ष में अगर मुस्लिमो का ध्रुवीकरण 70% तक हो गया तो बसपा को 70 सीट और बढ़ सकती हैं जिससे बसपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकती हैं
लेकिन आज वाला ही आंकड़ा रहा तो बसपा के जीतने वाले 100 विधायको में 55-60 के करीब मुस्लिम होंगे,जो टूटकर सरकार बनाने के लिए सपा के साथ जा सकते हैं और यही सर्वाधिक सम्भावना मुझे नजर आ रही है
कुल मिलाकर बिना किसी लहर के भी बीजेपी के साथ उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा समर्थन है पर लहर के आभाव में मुखर नही है और 2014 में बनी बनाई लहर को अपनी कार्यप्रणाली से खत्म करने के लिए केंद्र में मोदी सरकार का जुमलेबाजी वाला प्रदर्शन और बदली विचारधारा सर्वाधिक उत्तरदायी है,
यह सम्भावना भी है कि खण्डित जनादेश आने की सूरत में केंद्र/राजसभा में बसपा का सहयोग पाने और दलित हितैषी की इमेज चमकाने के लिए मोदी जी अटल आडवाणी की तरह यूपी में मायावती को समर्थन दे दें,भले ही इसके बाद यूपी में बीजेपी हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।।
बीजेपी इस बार यूपी में सरकार बनाने से चुकती है तो इसके लिए नरेंद्र मोदी जी ही पूर्ण रूप से उत्तरदायी होंगे।।
जय हिन्द।।