Wednesday, December 28, 2016

समाजवादी पार्टी में बेचारे राजपूत नेताओं की इतनी फजीहत क्यों????


समाजवादी पार्टी में बेचारे राजपूत नेताओं की फजीहत-----

फुटबॉल की तरह इधर से उधर लुढ़कते फिर रहे हैं,जाएं तो जाएं कहाँ,
मन्दिर के घण्टे की तरह जो भी आता है बजाकर चला जाता है !!!!!

किसी को अखिलेश यादव पेल देते हैं तो किसी को शिवपाल यादव!!!
कुछ सीधे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के ही गुस्से का शिकार बन जाते हैं।।

पेश है समाजवादी पार्टी में बेचारे ठाकुर नेताओं का हाल-----

1--रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया जी-------
राजा भैया सपा को समर्थन देने वाले सबसे प्रभावशाली राजपूत नेता हैं, राजा भैया के नाम पर ही 2012 में सपा को जमकर राजपूत वोट मिला था,
पर उनको भी अहीरों और मुस्लिम नेताओ जितना सम्मान नही दिया गया,
पहले अखिलेश यादवउन्हें मंत्री नही बनाना चाहते थे, फिर बना दिया तो कुछ समय बाद ही उनसे उनका कारागार मंत्रालय छीन लिया गया,
उसके बाद आजम खान के दबाव में जिया उल हक के मामले में निर्दोष होने के बावजूद उनसे मंत्री पद से इस्तीफा लिया गया,
जाँच में बेदाग होने के बाद मन्त्रीमण्डल में वापसी तो हुई,पर बाद में उनसे बिना पूछे मंत्रालय बदलकर महत्वहीन विभाग दिया गया!!!

राजा भैया द्वारा पिछले दशक से लगातार समाजवादी पार्टी का साथ दिए जाने के बावजूद उनके प्रबल प्रतिद्वंदी प्रतापगढ़ के ही कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी के साथ भी सपा हाईकमान ने गर्मजोशी के रिश्ते बनाए रखे।।

हाल ही में सपा के पारिवारिक घमासान में राजा भैया निष्पक्ष रहे थे, जिसके बाद शिवपाल समर्थक अतीक अहमद ने प्रतापगढ़ जाकर राजा भैया के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी की थी,पर अतीक अहमद के विरुद्ध कोई कार्यवाही नही की गयी।क्योंकि वो मुस्लिम है!!

अब देखना है कि राजा भैया घोर उपेक्षा के बावजूद कब तक सपा के साथ बने रहते हैं!!!!!

2----अमरसिंह----
अमरसिंह का आचरण देखकर इसको राजपूत नेता या राजपूत कहना भी अनुचित होगा,
बल्कि सच कहें तो उसका जिक्र करना भी अपराध है,
फिर भी उसके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि विगत 100 बरस में जितनी बेइज्जती और थू थू समाजवादी पार्टी में अमरसिंह की हुई है उतनी आज तक शायद ही किसी दूसरे राजपूत की कभी हुई हो!!!!!!
इससे ज्यादा इसके बारे में कुछ लिखना बोलना आवश्यक नही है👎👎👎👎

3---राजा महेंद्र अरिदमन सिंह उर्फ़ राजा भदावर-----
आगरा के एक बेहद प्रतिष्ठित राजपूत राजपरिवार में जन्मे राजा भदावर का भी सपा में जमकर अपमान हुआ,
बीजेपी सरकार में कई बार मंत्री रहे राजा साहब सपा में आ गए,
इनके दम पर ही पहली बार आगरा में विधानसभा चुनाव में सपा का खाता खुला,
उन्हें परिवहन विभाग में कैबिनेट मंत्री बनाया गया था,पर तुरन्त बाद ही इनकी उपेक्षा शुरू हो गयी!!!
पहले इनका मंत्रालय बदलकर महत्वहीन विभाग दिया गया और कुछ दिन बाद अचानक इन्हें अपमानजनक ढंग से मन्त्रीमण्डल से बर्खास्त ही कर दिया गया!!
सुना है इनसे मुलायम सिंह ही किसी कारणवश नाराज थे।।

तब से राजा साहब बिना मंत्री पद के सपा में ही बने हुए हैं ,इन्हें सपा ने टिकट भी दे दिया है,
देखते हैं राजा साहब का अगला कदम क्या होता है !!

4---ठाकुर ओमप्रकाश सिंह---
गाजीपुर के दिग्गज नेता,एक पुराने सपाई और मुलायम परिवार के बेहद निष्ठावान सिपाही रहे हैं ओमप्रकाश सिंह जी,
मुलायम सिंह की सरकार में भी मंत्री बनते आए हैं पर अखिलेश यादव, राजा भैया की तरह ही इनसे भी न जाने क्यों खार खाए बैठे रहे!!!
मुलायम कुनबे के घमासान में इनकी गिनती शिवपाल गुट में होने से मुख्यमंत्री अखिलेश ने इन्हें बिना कारण बताए कैबिनेट मंत्री के पद से सीधे बर्खास्त कर दिया!!!!!

5---ठाकुर राजकिशोर सिंह----
बस्ती जिले के दिग्गज नेता राजकिशोर सिंह को भी शिवपाल गुट का मानकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कैबिनेट मंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया!!!!😢😢

6---अरविन्द सिंह गोप----
कैबिनेट मंत्री अरविन्द सिंह गोप जो लगातार बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ सीट से जीतकर आ रहे थे,और इन्हें सपा की ओर से राजपूत नेता बनाकर प्रोजेक्ट किया जा रहा था,
उन पर शिवपाल यादव और मुलायम सिंह की गाज गिर गयी!!!
उनकी परम्परागत सीट से इनका टिकट काटकर बेनीप्रसाद वर्मा के पुत्र को टिकट दे दिया गया है 😢😢😢😢

7---कुंवर आनन्द सिंह-----
गोंडा जिले की मनकापुर रियासत के राजा कुंवर आनन्द सिंह की किसी जमाने में तूती बोलती थी, वो अब से 35 साल पहले भी यूपी में कैबिनेट मंत्री और 3 बार सांसद रह चुके हैं ,
पर सपा में राजा साहब की बुढ़ापे में इतनी फजीहत होगी, यह इन्होंने सपने में भी नही सोचा था,
इन्हें भी मुख्यमंत्री अखिलेश द्वारा कैबिनेट मंत्री के पद से सीधे बर्खास्त कर दिया गया!!!!!😢😢

8---एमएलसी आनन्द भदौरिया----
एक युवा राजपूत नेता जिसे मायावती सरकार में सपा के धरने प्रदर्शन में भाग लेने के कारण बसपाई पुलिस द्वारा निर्ममता से सरेआम पीटा गया था,
उन्हें सपा सरकार में अपने बलिदान का ये सिला मिला कि शिवपाल यादव ने इन्हें समाजवादी पार्टी से ही निकाल कर बाहर कर दिया!!!

9--योगेश प्रताप सिंह---
गोंडा के प्रभावी राजपूत नेता योगेश प्रताप सिंह को भी अखिलेश यादव ने मन्त्रीमण्डल से बर्खास्त कर दिया
😢😢

10--बृजभूषण शरण सिंह---
सपा हाईकमान की बेरुखी और उपेक्षा से नाराज होकर सांसद बृजभूषण शरण सिंह बीजेपी में दोबारा शामिल हो गए।।

11--जगदीश सिंह राणा-----
शिवपाल यादव द्वारा पहले सैफई महोत्सव में सहारनपुर के लोकप्रिय  और कद्दावर नेता जगदीश सिंह राणा जी (पूर्व सांसद और पूर्व कैबिनेट मंत्री ) को बुलाकर सपा में दोबारा आने का निमन्त्रण दिया,
राज्यसभा और विधानपरिषद में भेजने का भी आश्वासन दिया,
पर बाद में मुकर गए,
सैफई महोत्सव में जाने के कारण बसपा ने राणा जी और उनके भाई विधायक महावीर सिंह को निष्कासित कर दिया,
अब राणा परिवार बीजेपी में शामिल हो गया है।।

12--पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर---
सपा सरकार बनने के बाद नीरज शेखर की भी सपा सरकार में जमकर उपेक्षा की गयी,इनके परिवार के सदस्यों को एमएलसी चुनाव भी मजबूरन बसपा से लड़ना पड़ा,
बाद में पूर्वांचल में स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के अनुयायी राजपूत वोटों के लालच में बेमन से इन्हें राज्यसभा में भेजा गया।।

इस प्रकार समाजवादी पार्टी में राजपूत नेताओं की कितनी फजीहत हुई इसका अंदाजा लगाया जा सकता है,
किसी राजपूत नेता को अखिलेश का कोपभाजन बनना पड़ा, तो किसी पर शिवपाल यादव की गाज गिरी, किसी को सीधे मुलायम सिंह ने ही लपेट दिया,

इस दौरान लगातार अपने बयानों और क्रियाकलाप से सरकार को संकट में डालने वाले नेताओं आजम खान, अतीक अहमद, मुख़्तार अंसारी जैसे किसी मुस्लिम नेताओ का कभी बाल भी बांका नही हुआ,
न किसी अहीर नेता का नुक्सान हुआ,
गाज गिरी तो राजपूतो पर!!!!

जबकि 2012 में सपा के टिकट पर 30 से ज्यादा राजपूत विधायक जीतकर आए थे, इस बार तो टिकट ही 25 के आसपास मिले हैं!!!!

"पराएधीन सपनेहुँ सुख नाही" 😢😢😢😢
सिर्फ सामन्त बनकर सत्ता सुख भोगने की चाहत रखने वाले स्वार्थी राजपूत नेताओं के लिए यह तिरस्कार एक बड़ा सबक है।।

दोस्तों, गलती सपा की नही बल्कि इसपर भरोसा करने वाले राजपूतो की है,
ये वही पार्टी है जिसने गरीब राजपूत किसानो की हत्यारिन फूलन देवी को रिहा किया और सांसद बनाकर राजपूत समाज की अस्मिता को ठेंगा दिखाया था, यह वही दल है जिसकी सरकार ने अयोध्या में सूर्यवंशी क्षत्रिय भगवान श्रीराम के भक्तों पर गोलियां चलवाई थी,

यह वही सपा है जिसकी सरकार में उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के सैंकड़ो आंदोलनकारियों (जिनमे ब्राह्मण राजपूत अधिक थे) पर निर्ममता से रामपुर तिराहा पर गोलिया चलवाई गयी थी और ओरतो के साथ बलात्कार तक हुए थे,

पिछले 5 साल में राजपूतो के बच्चों को न पर्याप्त नोकरिया मिली  न स्कुल कॉलेज में एडमिशन मिले,
लाखो राजपूत युवा बेरोजगार बने घूम रहे हैं 😢😢😢😢
और कुछ राजपूत नेता निजी स्वार्थ में सपा में सामन्त बनकर सत्ता सुख भोग रहे थे, अब अपमानित हो रहे हैं!!!

एक बार सपा नेता बेनीप्रसाद वर्मा ने कहा था कि आरक्षण विरोधियो से डंडे लेकर निपटा जाएगा!!!!

तो खाओ भाइयो डंडे और सहो अपमान ,तिरस्कार और बेइज्जती!!!!

जय राजपूताना 😷😷😷😷😷😷😷😷

Friday, December 2, 2016

नोटबन्दी का मूल उद्देश्य अब विफल होता दिख रहा है, जिम्मेदार कौन???

क्या विफल गया नोटबन्दी का मूल उद्देश्य?--------

नोटबन्दी का मूल उद्देश्य काले धन पर प्रभावी रोकथाम और केंद्रीय राजस्व में भारी वृद्धि करना था,
किन्तु यह मूल उद्देश्य विभिन्न कारणों से पूरा होता हुआ नही दिख रहा है।

दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक जितनी कीमत के नोट छापकर जारी करती है उसकी कीमत के बराबर सोना रिजर्व में रखता है,उस सोने के मान के कारण ही हर करेंसी पर लिखा होता है कि "मैं धारक को __रूपये अदा करने का वचन देता हूँ।।

जानकारी मिली है कि 500₹ और 1000₹ के नोट के रूप में रिजर्व बैंक द्वारा करीब 16 लाख करोड़ रूपये की करेंसी जारी की थी,
नोटबन्दी करते हुए मूल सोच यह थी कि जिनके पास 500₹ और 1000₹ के नोट के रूप में काला धन होगा वो उसे घोषित कर बैंको में जमा करवाने का जोखिम नही उठाएंगे, और उसे नष्ट कर देंगे या 30 दिसम्बर के बाद वो स्वत नष्ट हो जाएगी।

प्रारम्भ में अनुमान लगाया गया था कि नोटबन्दी के निर्णय के बाद उक्त 16 लाख करोड़ की करेंसी में से लगभग 25% यानि करीब 4 लाख करोड़ की करेंसी बैंको में वापस नही आएगी।

चूँकि उस करेंसी के बराबर रिजर्व बैंक के पास सोना उपलब्ध है इसलिए रिजर्व बैंक उतने ही मूल्य के नए नोट छाप सकेगा वो भी बिना मुद्रा स्फीति बढ़ाए हुए।
यह अनुमानित 4 लाख करोड़ की धनराशि रिजर्व बैंक का शुद्ध लाभ होता और रिजर्व बैंक इसे राष्ट्रीय आय घोषित कर देता जैसा की पहले से तय था।।

इसके अतिरक्त बैंको में जो धनराशि जमा हुई है उनमे पेनल्टी आदि लगाने से आयकर के रूप में करीब 50 हजार करोड़ रूपये के अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति का भी अनुमान है जो पूरा हो सकता है।

किन्तु मूल उद्देश्य विफल क्यों हुआ????
मूल उद्देश्य विफल इसलिए हो गया क्योंकि नकदी के रूप में काला धन रखने वालो ने विभिन्न जुगत भिड़ाकर या तो बैंक अधिकारियो की मिलीभगत से अपने नोट बदलवाकर नई करेंसी प्राप्त कर ली, या सोने इत्यादि में निवेश कर लिया।।

अधिकतर राजनेताओं के पेट्रोल पम्प और गैस एजेंसी हैं जिनमे  जान बूझकर पुरानी अमान्य करेंसी जारी रखी गयी जिससे पेट्रोलपंप, गैस एजेंसी, ट्रांसपोर्टर, परिवहन विभाग के माध्यम से बड़ी मात्रा में 500₹ और 1000₹ की नकदी के रूप में उपलब्ध काला धन ठिकाने लगा दिया गया।।

रही सही कसर कुछ बैंककर्मियो ने पूरी कर दी जो आम जनता को पुरे दिन लाइन में खड़ा रखकर कैश खत्म होने की घोषणा कर देते हैं और चोर दरवाजे से बड़ी मछलियो की पुरानी करेंसी को बदलकर नए नोट उन्हें उपलब्ध करवा रहे हैं।

अब हालत यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा जारी 16 लाख करोड़ की पुरानी करेंसी (500/1000₹ के नोट के रूप में) में से करीब 4 लाख करोड़ पहले से बैंको में जमा था, शेष 12 लाख करोड़ जो नागरिको पर सफेद या काले धन के रूप में उपलब्ध था, नोटबन्दी के एक माह पूरा होने से पहले ही उसमे से 9 लाख करोड़ बैंको में जमा भी हो चूका है,
और शेष 3 लाख करोड़ में से भी अधिकांश धनराशि 30 दिसम्बर तक किसी न किसी रूप में आ ही जाएगी,

जिसका साफ़ अर्थ है कि भारतीय रिजर्व बैंक जो कई लाख करोड़ के लाभ की उम्मीद में था, वो उद्देश्य अब विफल होता दिखाई दे रहा है।
इस आय से देश पर विदेशी कर्जो को चुकाया जा सकता था,और कई जनकल्याणकारी योजनाएं लागु की जा सकती थी पर अब ऐसा होता नही दिख पा रहा है।

अतिरिक्त आयकर के रूप में जो राजस्व मिलेगा भी वो भी इस निर्णय से हुए लघु मध्यम उद्योगों में तालाबन्दी, बेरोजगारी, मन्दी, कम बिक्री से जो विभिन्न कर राजस्व में कमी आएगी उसकी तुलना में बेकार सिद्ध होगा, इसी कारण अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों द्वारा भी भारत की जीडीपी व्रद्धि दर का अनुमान घटा दिया गया है,
माना जा रहा है कि इस निर्णय से आई मन्दी से भारत की जीडीपी वृद्धि दर में 2% की भारी गिरावट होगी जिससे देश में अचानक से बेरोजगारी और अव्यवस्था फ़ैल सकती है और उत्पादन भी ठप हो सकता है।।
आज एक महीना बाद भी करोड़ो देशवासी बजाय मेहनत मजदूरी करके उत्पादन करने के बैंक/एटीम की लाइन में लगे हुए हैं।
निम्न मध्यम वर्ग ,छोटे दुकानदारो मध्यम व्यापारियो को चोर की दृष्टि से देखा जा रहा है जबकि किसी भृष्ट राजनेताओ माफियाओ का बाल भी बांका नही हो पाया है।

और अब निर्णय असफल होता देखकर कैशलेस इकॉनोमी का जुमला दिया जा रहा है, ऑनलाइन ट्रांसेक्शन, फंड ट्रांसफर, पेटीएम आदि के द्वारा पूर्ण क्रांति की बात उस देश में की जा रही है जहाँ आज भी 40% आबादी अनपढ़ है।
कुल मिलाकर कोई अंधभक्त चाहे जितनी मर्जी जयजयकार करे किन्तु यह शानदार और उचित निर्णय था जिसे लागू करने में इतनी घोर लापरवाही बरती गयी कि इस निर्णय का मूल उद्देश्य ही विफल होता दिख रहा है।इस लापरवाही के जिम्मेदार वित्तमंत्री अरुण जेटली और आरबीआई गवर्नर हैं।

मैं भले ही मोदीभक्त नही हूँ किन्तु राष्ट्रभक्त अवश्य हूँ, मोदी जी का और उनके इस निर्णय का प्रशंसक भी हूँ।
किन्तु नोटबन्दी के राष्ट्रहित के निर्णय का निकृष्ट कोटि के क्रियान्यवयन होने से इसका मूल उद्देश्य ही विफल हो गया है। जिसका मुझे दुःख है।

Thursday, November 17, 2016

अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो इन दो नम्बर के धंधो का क्या होगा ????😂😂

अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो इन दो नम्बर के धंधो का क्या होगा---

चर्चाओं के अनुसार अगर जल्द ही देश में 3 हजार से ऊपर के नकद लेन देन पर रोक लग गयी, इससे ऊपर सभी लेन देन चैक/डेबिट-क्रेडिट कार्ड/ account to account money transfer से होने लगेऔर सोना सरकारी खजाने में जमा करवाकर नागरिकों को गोल्ड बांड दे दिए गए, तो जनता के पास सिर्फ सब्जी, फल, बिस्कुट-नमकीन खरीदने या चाट पकोड़ी खाने के ही नकद पैसे होंगे,

ऐसी दशा में ये धन्दे कैसे चलेंगे???
1--रिश्वत
2--कमीशन
3--फिरौती
4--डकैती/लूटमार/राहजनी
5--रंगदारी
6--आरटीआई एक्ट के नाम पर वसूली/ब्लैकमेलिंग
7--हफ्ता/महीना वसूली
8--प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के पत्रकारों द्वारा राजनैतिक दलों, माफियाओ,नोकरशाहों से हिस्सा वसूली
9--अनधिकृत ब्याज का धन्दा
10--पेटी ठेकेदारी (रजिस्टर्ड ठेकेदार के नीचे)
11--प्रॉपर्टी सौदों में कमीशन-दलाली (बिना पंजीकरण)
12--गुंडागर्दी/बाहुबलीपना/लठैती/नेताओं के साथ हथियार लेकर चलने वाले चमचे
13--शराब माफिया/खनन माफिया/वन माफिया और तस्कर
14--स्कुल-कॉलेजो में लाखो करोड़ो का डोनेशन
15--धर्मान्तरण, मदरसों मिशनरियों ढोंगी मठों के क्रियाकलाप
16--भृष्ट एनजीओ
17--आतंकवाद,नक्सलवाद,
18--हवाला ,सट्टा -खाईबाड़ी, मैच फिक्सिंग
19--पशु तस्करी, गौहत्या,
20--छुटभैया नेतागिरी 

इन जैसे सब धंदो की बसन्ती फिट हो जाएगी अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो,
क्योंकि उपरोक्त में से कोई भी धंदेबाज अपनी  राशि अपने या अपने परिचित के खाते में प्राप्त करने की हिम्मत नही करेगा!!!!
इसलिए जो भी भाई इन धंधो से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं वो अपना दूसरा रोजगार ढूंढने में लग जाएं नही तो भूखे मर जाओगे।।

हाँ अम्बानी अडानी जैसो का धंधा पहले की तरह चलता फलता फूलता रहेगा क्योंकि ये नकद की बजाय चोर दरवाजों से बड़े राजनेताओं/ बड़े नोकरशाहों को शेयर आदि बांटकर अपना और उनका काला धन सफेद करते ही रहेंगे..

Monday, November 14, 2016

पहले विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और कॉर्पोरेट्स के गठजोड़ पर हो सर्जिकल स्ट्राइक, न कि मध्यम वर्ग पर


क्या होगा अगर नकद लेन देन बन्द हो जाए और मायावती जी देश की पीएम बन जाए तो---

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में आतंकवाद निरोधक पोटा कानून लाया गया था, आतंकवादियों की कमर तोड़ने के लिए
मगर यूपी में मायावती ने उसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों से बदला भांजने में किया न कि आतंकवादियों के विरुद्ध,

कानून कितना भी सख्त बना दें अगर लागु करने वाले की नीयत सही नही है तो उसके दुष्परिणाम बड़े भयावह हो सकते हैं।।

अब चर्चा चल रही है कि जल्द ही 3 हजार रूपये से ऊपर का लेन देन और खरीद फरोख्त नकद की बजाय चैक या account to account money transfer से होगा, और एक परिवार का एक ही बैंक खाता होगा!!!!!

इसका सकारात्मक परिणाम यह होगा कि टैक्स चोरी करना असम्भव हो जाएगी और बड़ी पारदर्शिता हो जाएगी।

किन्तु कुछ दुष्परिणाम पर भी विचार करिये----
कल को मायावती ,जयललिता ,केजरीवाल या ममता बनर्जी जैसे देश के प्रधानमन्त्री बन जाते हैं और उन्होंने कोई कानून पास कर दिया कि जिनपर भी sc/st एक्ट या साम्प्रदायिक हिंसा निवारण कानून (जिसे यूपीए सरकार लाने वाली थी) लगेगा ,
उनके बैंक खाते पर रोक लगा दी जाएगी😯😯😯😯

तो उस आरोपित व्यक्ति के परिवार को भूखो मारे जाने को विवश होना पड़ जाएगा या भीख मांगनी पड़ जाएगी, न ही वो व्यक्ति धन के आभाव मेंअपनी क़ानूनी लड़ाई लड़ पाएगा,
क्योंकि नकदी उसके पास होगी नही, और बैंक खाते पर भी रोक लग जाएगी!!!!

ऐसी स्थिति में सरकार चाहे तो आपका आर्थिक बहिष्कार कर आपको बेमौत मार सकती है,सरकार का विरोध किया तो भूखे मरने को तैयार हो जाएं।।
ये एक प्रकार से मानवाधिकारों को भी कुचलने का अधिकार देना होगा।।
इस प्रकार के कानून और शक्तियां अधिनायकवाद को भी जन्म दे देते हैं।

इसलिए मोदी जी को सर्जिकल स्ट्राइक की अगली शुरुवात पहले भृष्ट राजनेताओं और राजनैतिक दलों के खिलाफ करनी होगी, भृष्ट नेता चाहे किसी भी दल से हो उनको धूल में न मिलाया गया, तो उनके इशारे पर काम करने वाली सरकारी मशीनरी और अधौगिक जगत पर रोक लगाना असम्भव  होगा।।

किसी भी कानून का दुरूपयोग हो सकता है अगर उसे लागु करने वाली विधायिका और कार्यपालिका बेईमान हो,और भृष्ट न्यायपालिका उन्हें सरक्षण प्रदान करें।।

मोदी जी से निवेदन है कि आम व्यापारी/किसान/मध्यम वर्ग/आढ़ती/एम्प्लोयी या छोटी मछलियों जिसने पहले जानकारी के आभाव या लापरवाही/लालच में प्रोपर टैक्स न दिया हो,
पहले उन पर सर्जिकल स्ट्राइक के बजाय भृष्ट विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर पर चोट करें और उन्हें अपने इशारो पर नचाने वाले बड़े कार्पोरेट घरानो के विरुद्ध कार्यवाही का साहस दिखाएँ,
जो बड़े कॉर्पोरेट्स घराने बैंको का हजारो करोड़ ऋण दबाए बैठे हैं उनसे सख्ती से ऋण की वसूली की जाए।।

बीजेपी में भी बहुत से भृष्ट राजनेता हैं और बैंको के हजारो करोड़ ऋण अदा न करने वाले घोटालेबाज ओधोगिक घरानो से उनकी मित्रता हैं, यूपीए शासन के बेईमान नेताओं से अंदरुनी गठजोड़ रखने वाले कई बीजेपी नेता आज सत्ता में प्रभावशाली हैं,
आम जनता में विश्वास जगाने के लिए इन भृष्ट बीजेपी नेताओं पर भी सर्जिकल स्ट्राईक पहले होनी चाहिए।

अगर विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और बड़े औधौगिक घराने सुधर गए तो अब तक प्रोपर टैक्स जमा न करने वाला मध्यम वर्ग अपने आप सुधर जाएगा।।

Saturday, November 12, 2016

मोदी जी, जिनके पास चैकबुक/डेबिट कार्ड नही हैं वो गरीब कहाँ जाएं????


जिनके पास चैकबुक/डेबिट कार्ड नही हैं वो गरीब कहाँ जाएं-----

कमाल है,
झूटली उर्फ़ केतली जैसे महाभृष्ट राजनेता भी काले धन को लेकर उपदेश झाड़ रहे हैं 😶😶
और कई ऐसे बेईमान अफसर जिनके पास इस समय संयोगवश ज्यादा नकदी नही थी वो भी राजा हरिश्चंद्र बनकर खूब छाती ठोक रहे हैं और निर्णय की सराहना कर रहे हैं,

झूटली के अनुसार लोग प्राइवेट अस्पतालों और शादी ब्याहों में चैक और कार्ड से भुगतान करें!!!!!!
अबे केतली...... पहले ये तो सर्वे करवा ले,कि कितने परिवारो के पास भारत में इस समय चैक बुक या डेबिट/क्रेडिट कार्ड उपलब्ध है????

भले ही जनधन के करोड़ो खाते खुल गए हों पर अभी भी 70% भारतियों के पास चैक बुक नही है और इस समय लाइन में लगकर लेना सम्भव भी नही है, किसी की चैक बुक खत्म हो गयी तो दूसरी चैक बुक आने में भी समय लगता है!!!!

मतलब किसी ऐसे आदमी को जिसके पास न चैक बुक है न डेबिट कार्ड (भारत के 70% परिवार), उनका कोई मरीज प्राइवेट अस्पताल में भर्ती है तो उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाए????

या उसकी बेटी की शादी है तो वो भीख मांगकर जरूरत पूरी करे या सादगी में 2 जोड़ी कपड़ो के साथ 4 आदमियों की बरात के साथ बेटी विदा कर दे?????

नोटबन्दी का मोदी जी का निर्णय शानदार है इसके दूरगामी लाभ भारतवर्ष को अवश्य मिलेंगे,लेकिन इसे लागु करने में जबरदस्त लापरवाही हुई है जिससे आम जनता हलकान हो गयी है।
क्या नोटबन्दी के शानदार निर्णय को समुचित व्यवस्था के साथ लागु न करने के लिए देश के वित्त मंत्री को अविलम्ब बर्खास्त नही कर देना चाहिए?????

Thursday, November 10, 2016

कहाँ गया गुजरात और वीरभूमि मेवाड़ का सैन्य गौरव ?????


क्या नष्ट हो गया गुजरात और मेवाड़ का सैन्य गौरव??--------

एक बार फील्ड मार्शल सैम मानेकशा अहमदाबाद गए थे तो एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सेना में विभिन्न प्रदेशो के सैनिको के साथ रहकर वो पंजाबी, गढ़वाली, हिमाचली, मराठी, हरियाणवी, मारवाड़ी, भोजपुरी, हिमाचली, डोगरी, कूर्गी भाषा सीख गए हैं,
वहां कुछ श्रोताओं ने उनसे पूछा कि फिर आपने गुजराती क्यों नही सीखी??
तो सैम ने जवाब दिया कि उनकी सर्विस के दौरान उन्हें भारतीय सेना में गुजराती जवान और ऑफिसर न के बराबर मिले तो वो कैसे गुजराती सीख पाते????
जबकि देश के दूसरे आर्मी चीफ जनरल राजेन्द्र सिंह जाडेजा गुजरात से ही थे पर बाद में यह क्रम नही बढ़ा।।

भारतीय सेना में 10% से ज्यादा जवान अकेले हरियाणा से आते हैं जबकि हरियाणा की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 2% ही है,
इससे कुछ कम आंकड़ा पंजाब का है।

सेना में उत्तराखण्ड हिमाचल प्रदेश और जम्मू के जवानो की कुल संख्या भी करीब 15% है जबकि इन पहाड़ी प्रदेशों की कुल जनसंख्या देश की कुल आबादी का मात्र 2% है।

इसी प्रकार यूपी का प्रतिनिधित्व करीब 15% और बिहार का 7% है जबकि इन दोनों प्रदेशो में देश की लगभग 25% आबादी निवास करती है

सेना में पंजाब और राजस्थान का प्रतिनिधित्व भी अब जवान और अधिकारी स्तर दोनों जगह सिकुड़ रहा है।

जबकि समूचे गुजरात और राजस्थान की वीरभूमि मेवाड़ का प्रतिनिधित्व भारतीय सेना में न के बराबर है ,ऐसा क्यों हुआ????
मेवाड़ वीरभूमि के रूप में सारे विश्व में विख्यात रहा है और मौहम्मद गौरी ,अकबर को सबसे करारी मात भी गुजरात में ही मिली थी, फिर अब क्या हुआ???

कुछ लोग कहेंगे कि इन इलाको में राजपूत और दूसरी मार्शल जातियां सेना में जाने की बजाय व्यापार और विदेश में जाना पसन्द करते हैं,
पर गुजरात और मेवाड़ के राजपूत पुलिस में खूब जाते हैं और हजारो बेरोजगार भी हैं,
फिर भारतीय सेना में जवान और अधिकारी स्तर पर भर्ती क्यों नही होते???
क्या गुजरात और मेवाड का सैन्य गौरव और क्षमता अब नष्ट हो चुका है?????
ऐसा प्रतीत होता है कि लगातार युद्धों में वीरगति के बाद मेवाड़ में राजपूतों की संख्या में बड़ी गिरावट भी हुई, महाराणा भीमसिंह के समय उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए भाड़े के सिंधी मुसलमान भर्ती करने पड़े थे क्योंकि मेवाड़ में राजपूत बहुत कम बचे थे।

वहीँ समूचे गुजरात से भारतीय सेना में जितने जवान हैं उनसे ज्यादा जवान अकेले यूपी के गहमर और आसपास के गांव से हैं जिनमे अधिकतर सिकरवार राजपूत हैं।
अकेले हरियाणा के रेवाड़ी जिले से 25 हजार अहीर जवान देश की प्रतिरक्षा सेना में हैं ।

आज जवान और अधिकारी दोनों स्तर पर हरियाणा और देश के पहाड़ी क्षेत्र ही भारतीय सेना की रीढ़ बन गए हैं ,पंजाब और राजस्थान शुरुवाती दिनों की बढ़त के बाद अब पिछड़ गए हैं।पंजाब से खालिस्तान आंदोलन के बाद सेना का क्रेज खत्म हो गया है,अब पंजाब के सिक्ख सेना की बजाय विदेश जाना पसन्द करते हैं।

मेवाड़ से भारतीय सेना में भर्ती क्यों नही होती इसके और क्या कारण हो सकते हैं???
क्या शारीरिक कद काठी और लडाकूपन में भी कमी आ गयी है???
या ब्रिटिश काल से आज तक किसी ख़ास कारण से जान बूझकर इनके साथ भेदभाव हो रहा है??

Wednesday, November 9, 2016

काश अमरसिंह ने अमेरिका के क्लिंटन फाउंडेशन की बजाय राजपूत समाज को बड़ा दान दिया होता


काश अमरसिंह ने यह दान अमेरिका के क्लिंटन फाउंडेशन की बजाय राजपूत समाज को दान दिया होता-------

कल यूएस प्रेजिडेंट चुनाव में हिलेरी क्लिंटन की हार के साथ सपा नेता अमरसिंह का भारतीय राजनीति पुनरुत्थान का सपना टूट गया,
सुपर पॉवर अमेरिका का दखल भारतीय राजनीति में ऊपर से दिखाई न देता हो पर यह कटु सत्य है।
और विश्व में जिसके भी सर पर अमेरिका का हाथ हो वो गधा भी पहलवान बन जाता है,

जॉर्ज बुश के बाद अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन अपनी पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनने की दौड़ में सबसे आगे थी,
तभी समाजवादी पार्टी के नेता अमरसिंह ने उनके पारिवारिक ट्रस्ट क्लिंटन फाउंडेशन को 5 मिलियन डॉलर (कुछ अपुष्ट सूत्रो के अनुसार 10 मिलियन) डोनेशन दिया।।

लेकिन हिलेरी इस दौड़ में बराक ओबामा से पिछड़ गयी और इसके कुछ ही दिन बाद अमरसिंह को समाजवादी पार्टी से बेइज्जत करके निकाल दिया गया।।इतनी बुरी बेइज्जती आज तक किसी नेता की नही की गयी जितनी रामगोपाल यादव ,आजम खान, अखिलेश यादव द्वारा अमरसिंह की हुई।
इसके बाद अमरसिंह लम्बे समय के लिए राजनैतिक बियाबान में चले गए,

कुछ माह पूर्व हिलेरी क्लिंटन अपने दल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार घोषित हुई और सभी सर्वे में उनकी बढ़त बताई गयी।।
इसी के साथ भारतीय राजनीति में अमरसिंह की पुन: एंट्री हो जाती है और आश्चर्यजनक रूप से उन्हें फिर से समाजवादी पार्टी में लाकर राज्यसभा सदस्य और फिर महासचिव नियुक्त कर दिया जाता है,हालाँकि अब भी समाजवादी पार्टी में इनकी जलालत खत्म नही हुई और अखिलेश आजम रामगोपाल ने इन्हें सार्वजनिक रूप से दलाल तक कह दिया।।

विश्वास मानिये, कल अगर हिलेरी क्लिंटन जीत जाती तो भारतीय राजनीति में अमरसिंह का सितारा बुलन्दियों पर पहुंच जाता और उसको केंद्र सरकार भी नजरअंदाज नही कर पाती!!!

मुलायम सिंह परिवार में अब जैसे ही एकता होगी और एक मंच पर सभी पारिवारिक सदस्य बैठेंगे तो सबसे पहले अमरसिंह को ही दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाएगा।।

काश अमरसिंह ने यह दान बजाय अमेरिका के क्लिंटन फाउंडेशन के राजपूत समाज को दिया होता!!!!!
अमरसिंह द्वारा क्लिंटन को दान दी गयी धनराशि आज के समय में करीब 100 करोड़ रुपया बैठती है,
इस धनराशि से अमरसिंह चाहते तो यूपी के हर जिले में राजपूत भवन/राजपूत छात्रावास बनवा सकते थे,

अगर अमरसिंह ऐसा करते तो बजाय मुलायम अहीर परिवार के बीच जलील होने के राजपूत समाज में हमेशा के लिए वाकई में अमर हो जाते,

अब भी कुछ बचा खुचा है अमरसिंह जी के पास, तो बजाय इधर उधर देने के उसे राजपूत समाज को दें और प्रायश्चित करे, समाज उनकी गलतियां क्षमा करके उनका दिल खोलकर स्वागत करेगा और किसी उन्हें जातिवादी परिवारवादी दल की गुलामी नही करनी पड़ेगी।।