Thursday, January 26, 2017

सर्वसमाज के समर्थन से थानाभवन सीट से सुरेश राणा की जीत पक्की,बनेंगे कैबिनेट मंत्री

वेस्ट यूपी में शामली जिले की थानाभवन सीट------

कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे होते हैं जहाँ किसी व्यक्तित्व के प्रभाव से जातिगत समीकरण धरे के धरे रह जाते हैं, ऐसी ही एक सीट है शामली की थानाभवन सीट जहाँ अपनी लोकप्रियता के दम पर वर्तमान विधायक सुरेश राणा सामाजिक समीकरणों को धता बताकर पुन: जीतने जा रहे हैं और यूपी में बीजेपी सरकार बनी तो कैबिनेट मंत्री भी अवश्य बनेंगे।

पिछली बार सुरेश राणा नए थे और मुस्लिम मतों में बंटवारे की वजह से मामूली अंतर से जीत पाए थे, इस बार मुजफ्फरनगर शामली इलाके में हुए साम्प्रदायिक तनाव से उनकी और संगीत सोम की छवि हिन्दू हृदय सम्राट की बन चुकी है। अब उनकी लोकप्रियता और पहचान राष्ट्रव्यापी हो चुकी है, इस बार इन्हें उन वर्गों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है जो गत चुनाव में नही मिल पाया था,

बसपा ने इस सीट से पूर्व विधायक राव अब्दुल वारिस खान (मुस्लिम राजपूत) को, सपा ने डॉक्टर सुधीर पवार (जाट समाज से) को, और रालोद ने राव जावेद खान (मुस्लिम राजपूत) को टिकट दिया है, इस बार मुस्लिम मतों में बिखराव पहले की अपेक्षा कम है,
सपा उम्मीदवार को जाट मतदाताओं का समर्थन मुजफ्फरनगर दंगो में सपा सरकार की भूमिका के कारण नही मिल पा रहा है,
जाट वोट का बहुमत भी सुरेश राणा को मिल रहा है।

थानाभवन सीट का सामाजिक समीकरण और रुझान निम्नवत दिखाई दे रहा है-----

95,000 मुस्लिम
45,000 जाट
45,000 दलित
24,000 राजपूत
35,000 कश्यप
30,000 सैनी
10000 ब्राह्मण
10000 वैश्य व्यापारी
4000   रोड
30000 अतिपिछड़ा ,वाल्मीकि आदि

बसपा उम्मीदवार राव अब्दुल वारिस का समीकरण---

मुस्लिम---65000
दलित ---35000
अन्य---5000
कुल--105000 इनका वोट प्रतिशत होगा 70%==71000

बसपा उम्मीदवार को कुल 70000--75000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं।

सपा उम्मीदवार--डॉक्टर सुधीर पवार का समीकरण

मुस्लिम--10000
जाट--10000
अन्य---5000
टोटल 25000 इनका वोट प्रतिशत होगा 55%=14000

सपा उम्मीदवार को 13000--15000 वोट मिलता दिखाई दे रहा है, इनकी जमानत बचना भी मुश्किल है।

रालोद उम्मीदवार राव जावेद का समीकरण---

मुस्लिम --15000
जाट--15000
अन्य--5000

कुल 35000, इनका वोट प्रतिशत होगा 62%=23000

रालोद उम्मीदवार को 20000--25000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं।

बीजेपी उम्मीदवार सुरेश राणा का समीकरण---

मुस्लिम--1000
दलित--9000
जाट--24000
सैनी--25000
कश्यप--29000
ठाकुर--22000
अन्य हिन्दू--45000

कुल--155000 ,इनका वोट प्रतिशत होगा 58%=90000

बीजेपी उम्मीदवार को 87000--90000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं,

इस प्रकार कम से कम 15 हजार वोट से सुरेश राणा की विजय होगी,
किन्तु मुस्लिम वोट पूरी तरह एकजुट होकर बसपा प्रत्याशी पर पड गया या जाट/दलित मतदाताओ में बीजेपी को अधिक समर्थन न मिल पाया तो कांटे का चुनाव भी हो सकता है।
ऐसे में सुरेश राणा की राष्ट्रव्यापी छवि और उनके भावी कैबिनेट मंत्री होने की आशा उनके लिए संजीवनी का कार्य करेगी।।

अगर बीजेपी समर्थक वोटरो का मतदान प्रतिशत बढ़ा लिया जाए तो जीत का अंतर 30000 तक होगा भले ही 70% मुस्लिम बसपा को मिल जाए।।
मुस्लिम 90% एकतरफा गए तब भी बीजेपी जीत सकती है पर हिन्दू समाज में पोलिंग 70% से ऊपर करवाना होगा अन्यथा समस्या हो सकती है।

अभी तक के रुझान से सुरेश राणा थानाभवन सीट से लगातार दूसरी बार बाजी मारते दिखाई दे रहे हैं और यह जीत उनके राजनैतिक कैरियर में मील का पत्थर सिद्ध होगी।

Monday, January 23, 2017

सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद बीजेपी बढ़त पर, पर बहुमत से दूर

सपा कांग्रेस गठबंधन के बावजूद बीजेपी बढ़त पर---

यूपी में स्वर्ण हिन्दू वोट तकरीबन 25% है

यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में समाजवादी पार्टी को राजपूत ब्राह्मणों और अन्य स्वर्णो का 35% वोट मिला था, कांग्रेस को 10% स्वर्णो का वोट मिला था,
यानि 45% स्वर्णो का समर्थन इन दोनों को मिला था

इस बार सपा कांग्रेस ठगबंधन को स्वर्णो का मात्र 25% वोट मिलेगा।।
10% स्वर्ण वोट बसपा के साथ होगा जहाँ अकेला स्वर्ण टिकट बसपा का होगा।।

इस प्रकार स्वर्णो का 65% वोट इस बार बीजेपी के साथ होगा, जो पिछली बार 40% मात्र था।।

स्वर्ण मतदाता सपा बसपा की गुलामी से मुक्ति पाने को इस बार जमकर उत्साहपूर्वक मतदान करें तो
सपा के मत प्रतिशत में 5% की जबरदस्त कमी सिर्फ स्वर्णो के विमुख होने से होगी,
जबकि मात्र स्वर्णो के अतिरिक्त समर्थन से बीजेपी के मत प्रतिशत में 7% की वृद्धि होगी।।

बसपा के मत प्रतिशत में स्वर्णो के और विमुख होने से पिछले चुनाव की अपेक्षा 2% की और कमी होगी।।।
-----------------------------------------------------------------
यूपी में गैर मुस्लिम और गैर अहीर ओबीसी मतदाता , और अति दलित मतदाता तकरीबन 30% हैं

पिछली बार सपा को 45% अतिपिछड़े अतिदलित मतदाताओ ने वोट दिया था,
कांग्रेस को भी पिछली बार 15% अति पिछड़े अति दलित मतदाताओं ने वोट दिया था,

इस प्रकार सपा कांग्रेस दोनों को पिछली बार कुल 60% वोट अतिपिछड़ा अतिदलित का मिला था,
20% बीजेपी और 20% बसपा को मिला था,

इस बार इस वर्ग का झुकाव स्पष्ट बीजेपी की ओर है,
सपा कांग्रेस ठगबंधन को इस वर्ग का अधिकतम 40% वोट मिलेगा,
बीजेपी को 40% और बसपा को 20% वोट अतिपिछड़ा और अति दलित मिलेगा।।

इस प्रकार अतिपिछड़ा और अति दलित वर्ग के झुकाव के कारण सपा कांग्रेस के मत प्रतिशत में 6% की कमी होगी,
जबकि बीजेपी के मत प्रतिशत में 6% की स्पष्ट वृद्धि होनी तय है।।
----------------------------------------------------------
मुस्लिम वोट-----मुस्लिम वोट यूपी में 19% हैं

पिछली बार 65% मुस्लिम सपा के साथ, 15% कांग्रेस के साथ थे, कुल 80% मुस्लिम इस गठबंधन के साथ थे,
और 20% बसपा के साथ थे

इस बार सपा कांग्रेस गठबंधन को 75% मुस्लिम वोट मिलेगा, बसपा को 20% वोट मुस्लिम का मिलेगा।।

इस प्रकार प्रदेश स्तर पर सपा कांग्रेस गठबंधन को मुस्लिम वोट में भी सपा गठबंधन को कोई विशेस लाभ नही होगा।
लेकिन मुस्लिम बीजेपी को हराने के लिए रणनीतिक मतदान करें तो बीजेपी को 20/25 सीटो पर झटका जरूर दे सकते हैं ।
------------------------------------------------------------

इस प्रकार राजनीती में सदैव 2 और 2 मिलकर चार नही होते, कांग्रेस के पास ऐसा कोई वोटबैंक नही जो वो गठबंधन में सपा को ट्रांसफर कर सके,जबकि बिहार में जेडीयू और आरजेडी का वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हुआ था।
बल्कि कांग्रेस अधिकतर सीटो पर स्वर्ण उम्मीदवार खड़े करके बीजेपी का वोट काट लेती थी जो अब नही होगा।।
इसलिए सपा को इस गठबंधन से कोई लाभ नही होगा,
कांग्रेस की सीटें जरूर 25 से बढ़कर 35-40 हो सकती हैं।

गठबंधन के बावजूद सपा कांग्रेस को मिलाकर पिछली बार 43% वोट मिला था,
इस बार इनके वोट प्रतिशत में गठबंधन के बावजूद 11-12% की कमी होगी और बीजेपी के मत प्रतिशत में 13% की वृद्धि होगी।।।
बसपा के मत प्रतिशत में पिछली बार से भी 2% की कमी हो सकती है।

इस प्रकार बीजेपी को 2012 में वोट मिला था 21%
इस बार बीजेपी को वोट मिलेगा 33-34%

सपा कांग्रेस इन दोनों को मिलकर 2012 में वोट मिला था 43%
इस बार गठबंधन के बावजूद इन्हें वोट मिलेगा 31-32%

बसपा को 2012 में वोट मिला था 26%
इस बार इन्हें वोट मिलेगा 24-25%

इस प्रकार सीटों का आंकड़ा यह रह सकता है

बीजेपी        135-145
सपा            105-115
कांग्रेस           25 - 35
बसपा            75 - 85
आरएलडी        2-6
अन्य                8-12

Wednesday, January 18, 2017

यूपी में प्रथम चरण के 15 जिलो में सपा गठबंधन और बीजेपी के बीच कांटे का मुकाबला


यूपी विधानसभा चुनाव में प्रथम चरण में 15 जिलों की 73 विधानसभा सीटों का आकलन-------

प्रथम चरण में जिन 15 जिलों की 75 सीटो पर मतदान होगा, उनमे मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ,हापुड़, ग़ाज़ियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, हाथरस, मथुरा, एटा, कासगंज, फीरोजाबाद शामिल हैं।।

इस पुरे गंगा यमुना के दोआब के इलाके में सभी सामाजिक वर्गों की अनुमानित जनसंख्या और उनका रुझान मेरी सूक्ष्म बुद्धि के अनुसार निम्नवत नजर आ रहा है।।।
--------------------------------------------------
1----मुस्लिम आबादी तकरीबन 24%

इन 15 जिलों में मुस्लिम आबादी सर्वाधिक 24% है, शामली, मुजफ्फरनगर में करीब 40% ,मेरठ/बागपत में 32% और बाकि जगह 15% से 22% के बीच है।।

मुस्लिम मतों का रुझान इस प्रकार नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 70% मुस्लिम यानि कुल 16%
B--बसपा को 25% मुस्लिम यानि कुल 6%
C--बीजेपी को लगभग न के बराबर यानि 0.25%
D--अन्य को कुल 1.75%
------------------------------------------------
2---दलित वोट (जाटव/चर्मकार) तकरीबन 18%

दलित वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 4% यानि कुल 0.7%
B--बसपा को 90% यानि कुल 16.2%
C--बीजेपी को 5% यानि कुल 0.9%
D--अन्य को कुल 0.2%
-------------------------------------------------
3--जाट वोट तकरीबन 9%

जाट वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा कांग्रेस रालोद गठबंधन(?) को 70% यानि कुल 6%
B--बसपा को 5% यानि कुल 0.45%
C--बीजेपी को 25% यानि 2.25%
D--अन्य को 0.3%
--------------------------------------------------
4--ब्राह्मण वोट तकरीबन 9%

ब्राह्मण वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 20% यानि कुल 1.8%
B--बसपा को 10% यानि कुल 0.9%
C--बीजेपी को 70% यानि 6.2%
D--अन्य को 0.1%
----------------------------------------------------
5--राजपूत वोट तकरीबन 8%

राजपूत वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 10% यानि 0.8%
B--बसपा को 5% यानि 0.4%
C--बीजेपी को 85% यानि 6.5%
D--अन्य को कुल 0.3%
-----------------------------------------------------
6--वैश्य, पंजाबी, कायस्थ, सिक्ख आदि व्यापारी वर्ग तकरीबन 5%

व्यापारी वर्ग का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 35% यानि 1.70%
B--बसपा को 5% यानि 0.25%
C--बीजेपी को 60% यानि 3%
D--अन्य को कुल 0.05%
-----------------------------------------------------
7---गुर्जर वोट तकरीबन 4%

गुर्जरो का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 50 % यानि 2%
B--बसपा को 20% यानि 0.8%
C--बीजेपी को 30 % यानि 1.1%
D--अन्य को कुल 0.1%
----------------------------------------------------
8---अहीर वोट तकरीबन 4%

अहिरो का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 90% यानि  3.6%
B--बसपा को 2% यानि 0.08%
C--बीजेपी को 5 % यानि 0.2%
D--अन्य को कुल 0.12%
---------------------------------------------------
9--लोधी वोट तकरीबन 3%

लोधी वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 10 % यानि 0.3%
B--बसपा को 10% यानि 0.3%
C--बीजेपी को 80 % यानि 2.3%
D--अन्य को कुल 0.1%
--------------------------------------------------
10---त्यागी/रोड आदि अन्य किसान स्वर्ण जातियां तकरीबन 1%
इनका रुझान निम्नवत है।

A--सपा गठबंधन को 10 % यानि 0.1%
B--बसपा को 5% यानि 0.05%
C--बीजेपी को 80 % यानि 0.8%
D--अन्य को कुल 0.05%
-------------------------------------------------
11--अति पिछड़ा/गैर जाटव दलित/अन्य ओबीसी वर्ग तकरीबन 15%

इनका रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 20 % यानि 3.2%
B--बसपा को 10% यानि 1.5%
C--बीजेपी को 70 % यानि 10%
D--अन्य को कुल 0.3%
--------------------------------------------------

इस प्रकार प्रथम चरण में 15 जिलो की 73 सीटों में मत प्रतिशत का रुझान निम्नवत नजर आया है


A--सपा गठबंधन----36.2%

B--बसपा को ---26.93%

C--बीजेपी को ---33.5%

D--अन्य को कुल 3.37%

इसे थोडा अलग अलग समाज के मतदान प्रतिशत के कम ज्यादा होने से भी जोड़कर देखा जाए तो संशोधित आंकड़ा लगभग यह रहेगा।

A--सपा गठबंधन----36 %

B--बसपा को ---28 %

C--बीजेपी को ---33 %

D--अन्य को कुल 3 %

इस प्रकार प्रथम चरण के 15 जिलो में 73 सीटों पर समाजवादी पार्टी,रालोद,कांग्रेस गठबंधन वाकई में हुआ तो इस इलाके में अहीर आबादी कम होते हुए भी सपा आश्चर्यजनक रूप से बीजेपी पर 3% वोट की बढ़त बनाए हुए है।

इसका कारण मुस्लिम मतो की सपा के पक्ष में गोलबन्दी,
जाट गूजरों को अधिक टिकट दिए जाने के बावजूद उनका बीजेपी से किनारा करना,
बीजेपी में कल्याण सिंह व् अन्य नेताओ द्वारा खराब टिकट वितरण करवाना,
नोटबन्दी से व्यापारी वर्ग में भारी नाराजगी होना,
बीजेपी द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा न दिया जाना होगा।।

हालाँकि बीजेपी अभी भी कुछ टिकटों में बदलाव करके, और जाट ,गूजरो व्यापारियो को साधकर इस कमी की भरपाई कर सकती है।।

फ़िलहाल इन 73 सीटों में सपा गठबंधन 30 से 32 सीट, बीजेपी 25 से 27 सीट, बसपा 15 से 17 सीट जीतती नजर आ रही है।

दूसरे चरण में मुकाबला रुहेलखण्ड में होगा जहाँ मुस्लिम वोट 35% से 52% के बीच हैं और अहीर मतदाता भी अधिक हैं,
यहाँ भी सपा का पलड़ा भारी रहने के आसार होंगे, पर ध्रुवीकरण से बीजेपी भी मुकाबले में होगी।।

(नोट---प्रथम चरण की 73 सीटो के अनुमान में सपा कांग्रेस रालोद गठबंधन मानकर आकलन किया गया है, रालोद इस गठबंधन से दूर हुआ तो प्रथम चरण में बीजेपी बढ़त पर होगी

अगर रालोद ,सपा गठबंधन में शामिल नही हुआ तो जाट वोट जो 6% सपा गठबंधन को मिलते वो बीजेपी और रालोद में बंट जाएंगे,
इस दशा में बीजेपी को इस प्रथम चरण की सीटो में लगभग 35% मत प्राप्त होंगे,
सपा कांग्रेस गठबंधन 30% मत प्राप्त करके दूसरे स्थान पर होगा, वहीँ 27% मत पाकर बसपा तीसरे स्थान पर रहेगी।

इस दशा में इन15 जिलो की 73 सीटों पर बीजेपी को 40-42 सीट , सपा गठबंधन को 18-20 सीट , बसपा को 10-12 सीट और रालोद व् अन्य को 2-4 सीट सीट मिल सकती है।।

Monday, January 9, 2017

क्या विधानसभा चुनाव में बीजेपी द्वारा ठगा जाएगा सहारनपुर का राजपूत समाज??

क्या सहारनपुर के राजपूत समाज के साथ धोखा होगा??--------

मित्रों सहारनपुर की देवबन्द विधानसभा पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूतों का सबसे बड़ा गढ़ रहा है, अधिकतर राजपूत ही यहाँ से विधायक रहे हैं और स्वर्गीय ठाकुर फूलसिंह जी और स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह राणा यहाँ से जीतकर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं।

परिसीमन में इस सीट के 20 हजार राजपूत वोट समीप की गुर्जर बाहुल्य गंगोह सीट में जुड़ गए, जिससे देवबन्द में अब राजपूत वोट घटकर 40 हजार रह गए हैं और गंगोह में राजपूत वोट 25 हजार हो गए हैं।।

देवबन्द सीट पर त्यागी वोट 18 हजार, गुर्जर वोट 22 हजार और जाट वोट 5 हजार हैं जबकि 90 हजार मुस्लिम और 60 हजार दलित भी हैं

पिछली बार देवबन्द सीट पर समाजवादी पार्टी के स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह राणा जी जीतकर मंत्री बने थे, इस बार अभी तक उनकी पत्नी श्रीमती मीना राणा को सपा ने टिकट दिया था, पर उपचुनाव में इमरान मसूद के प्रत्याशी माविया अली मामूली अंतर से जीत गए थे क्योंकि राजपूत वोट बीजेपी और सपा के उम्मीदवारों के बीच बंट गए थे और वोटिंग प्रतिशत भी हिन्दू गाँवो में कम हुआ था।।

अब इस सीट पर राजपूतो के विरुद्ध बीजेपी और सपा दोनों में साजिश होने के समाचार मिल रहे हैं

सुना है इमरान मसूद का विधायक माविया अली लखनऊ में अखिलेश यादव गुट के सम्पर्क में है और समाजवादी पार्टी से टिकट मिलने का उसे आश्वासन भी मिल गया है!!!!
बसपा ने भी इस सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार माजिद को टिकट दिया है ,और कांग्रेस अलग लडी तो वो भी किसी मुस्लिम को ही टिकट देगी,
ऐसे में उपचुनाव की तरह ही बीजेपी किसी राजपूत उम्मीदवार को टिकट देती है तो वो आसानी से सीट निकाल लेगा!!!!

लेकिन इस हालात में बीजेपी में राजपूत विरोधी सक्रिय हो गए हैं और सपा कांग्रेस बसपा तीनो के मुस्लिम उम्मीदवार होने के कारण राजपूतो की लाचारगी का फायदा उठाने के लिए अब देवबन्द सीट से गैर राजपूत को बीजेपी टिकट देने के मूड में है और मात्र 18 हजार वोट वाला त्यागी समाज व् 4 हजार वोट वाले सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल शर्मा के भाई राहुल भी मौके का लाभ उठाने के चक्कर में हैं

यही नही बसपा सरकार 2007-2012 में पुलिस के दम पर राजपूतो का उत्पीड़न करने वाला घोर राजपूत विरोधी पूर्व बसपा विधायक मनोज चौधरी गुज्जर भी अब बीजेपी में शामिल होकर उन्ही राजपूतो के वोट का ख्वाब देख रहा है जिनका उसने बसपा सरकार में दमन करने का प्रयास किया था!!!!!

इस गुज्जर नेता की वर्ष 2009 में किसी गांव में राजपूत विरोधी टिप्पणी के कारण राजपूतो ने जमकर धुनाई भी कर दी थी,
ऐसा घोर राजपूत विरोधी नेता भी राजपूतो की हिंदूवादी सोच का लाभ उठाकर राजपूत बाहुल्य देवबन्द विधानसभा सीट से विधायक बनने का ख्वाब देख रहा है!!!!!!!!
बराबर की गंगोह विधानसभा से भी बीजेपी गुज्जर उम्मीदवार प्रदीप चौधरी को टिकट दे रही है,

और राजपूतो को मुर्ख बनाने के लिए देवबन्द की बजाय एक ऐसी सीट सहारनपुर देहात से टिकट दिया जा रहा है जहाँ मोदी लहर में भी कुछ दलित वोट भी पाने के बावजूद बीजेपी 2014 में पिछड़ गयी थी!!!!!
उस सीट पर कोई भी बीजेपी उम्मीदवार चुनाव नही जीत सकता,
पर राजपूतो को मुर्ख बनाने के लिए देवबन्द की बजाय सहारनपुर देहात जैसी बेहद कमजोर सीट से टिकट दिया जा सकता है!!!!!!!

क्या सहारनपुर का राजपूत समाज अपने साथ होने वाले इस धोखे को चुप रहकर बर्दाश्त करे या कोई अलग रणनीति पर विचार करे????

Wednesday, December 28, 2016

समाजवादी पार्टी में बेचारे राजपूत नेताओं की इतनी फजीहत क्यों????


समाजवादी पार्टी में बेचारे राजपूत नेताओं की फजीहत-----

फुटबॉल की तरह इधर से उधर लुढ़कते फिर रहे हैं,जाएं तो जाएं कहाँ,
मन्दिर के घण्टे की तरह जो भी आता है बजाकर चला जाता है !!!!!

किसी को अखिलेश यादव पेल देते हैं तो किसी को शिवपाल यादव!!!
कुछ सीधे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के ही गुस्से का शिकार बन जाते हैं।।

पेश है समाजवादी पार्टी में बेचारे ठाकुर नेताओं का हाल-----

1--रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया जी-------
राजा भैया सपा को समर्थन देने वाले सबसे प्रभावशाली राजपूत नेता हैं, राजा भैया के नाम पर ही 2012 में सपा को जमकर राजपूत वोट मिला था,
पर उनको भी अहीरों और मुस्लिम नेताओ जितना सम्मान नही दिया गया,
पहले अखिलेश यादवउन्हें मंत्री नही बनाना चाहते थे, फिर बना दिया तो कुछ समय बाद ही उनसे उनका कारागार मंत्रालय छीन लिया गया,
उसके बाद आजम खान के दबाव में जिया उल हक के मामले में निर्दोष होने के बावजूद उनसे मंत्री पद से इस्तीफा लिया गया,
जाँच में बेदाग होने के बाद मन्त्रीमण्डल में वापसी तो हुई,पर बाद में उनसे बिना पूछे मंत्रालय बदलकर महत्वहीन विभाग दिया गया!!!

राजा भैया द्वारा पिछले दशक से लगातार समाजवादी पार्टी का साथ दिए जाने के बावजूद उनके प्रबल प्रतिद्वंदी प्रतापगढ़ के ही कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी के साथ भी सपा हाईकमान ने गर्मजोशी के रिश्ते बनाए रखे।।

हाल ही में सपा के पारिवारिक घमासान में राजा भैया निष्पक्ष रहे थे, जिसके बाद शिवपाल समर्थक अतीक अहमद ने प्रतापगढ़ जाकर राजा भैया के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी की थी,पर अतीक अहमद के विरुद्ध कोई कार्यवाही नही की गयी।क्योंकि वो मुस्लिम है!!

अब देखना है कि राजा भैया घोर उपेक्षा के बावजूद कब तक सपा के साथ बने रहते हैं!!!!!

2----अमरसिंह----
अमरसिंह का आचरण देखकर इसको राजपूत नेता या राजपूत कहना भी अनुचित होगा,
बल्कि सच कहें तो उसका जिक्र करना भी अपराध है,
फिर भी उसके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि विगत 100 बरस में जितनी बेइज्जती और थू थू समाजवादी पार्टी में अमरसिंह की हुई है उतनी आज तक शायद ही किसी दूसरे राजपूत की कभी हुई हो!!!!!!
इससे ज्यादा इसके बारे में कुछ लिखना बोलना आवश्यक नही है👎👎👎👎

3---राजा महेंद्र अरिदमन सिंह उर्फ़ राजा भदावर-----
आगरा के एक बेहद प्रतिष्ठित राजपूत राजपरिवार में जन्मे राजा भदावर का भी सपा में जमकर अपमान हुआ,
बीजेपी सरकार में कई बार मंत्री रहे राजा साहब सपा में आ गए,
इनके दम पर ही पहली बार आगरा में विधानसभा चुनाव में सपा का खाता खुला,
उन्हें परिवहन विभाग में कैबिनेट मंत्री बनाया गया था,पर तुरन्त बाद ही इनकी उपेक्षा शुरू हो गयी!!!
पहले इनका मंत्रालय बदलकर महत्वहीन विभाग दिया गया और कुछ दिन बाद अचानक इन्हें अपमानजनक ढंग से मन्त्रीमण्डल से बर्खास्त ही कर दिया गया!!
सुना है इनसे मुलायम सिंह ही किसी कारणवश नाराज थे।।

तब से राजा साहब बिना मंत्री पद के सपा में ही बने हुए हैं ,इन्हें सपा ने टिकट भी दे दिया है,
देखते हैं राजा साहब का अगला कदम क्या होता है !!

4---ठाकुर ओमप्रकाश सिंह---
गाजीपुर के दिग्गज नेता,एक पुराने सपाई और मुलायम परिवार के बेहद निष्ठावान सिपाही रहे हैं ओमप्रकाश सिंह जी,
मुलायम सिंह की सरकार में भी मंत्री बनते आए हैं पर अखिलेश यादव, राजा भैया की तरह ही इनसे भी न जाने क्यों खार खाए बैठे रहे!!!
मुलायम कुनबे के घमासान में इनकी गिनती शिवपाल गुट में होने से मुख्यमंत्री अखिलेश ने इन्हें बिना कारण बताए कैबिनेट मंत्री के पद से सीधे बर्खास्त कर दिया!!!!!

5---ठाकुर राजकिशोर सिंह----
बस्ती जिले के दिग्गज नेता राजकिशोर सिंह को भी शिवपाल गुट का मानकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कैबिनेट मंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया!!!!😢😢

6---अरविन्द सिंह गोप----
कैबिनेट मंत्री अरविन्द सिंह गोप जो लगातार बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ सीट से जीतकर आ रहे थे,और इन्हें सपा की ओर से राजपूत नेता बनाकर प्रोजेक्ट किया जा रहा था,
उन पर शिवपाल यादव और मुलायम सिंह की गाज गिर गयी!!!
उनकी परम्परागत सीट से इनका टिकट काटकर बेनीप्रसाद वर्मा के पुत्र को टिकट दे दिया गया है 😢😢😢😢

7---कुंवर आनन्द सिंह-----
गोंडा जिले की मनकापुर रियासत के राजा कुंवर आनन्द सिंह की किसी जमाने में तूती बोलती थी, वो अब से 35 साल पहले भी यूपी में कैबिनेट मंत्री और 3 बार सांसद रह चुके हैं ,
पर सपा में राजा साहब की बुढ़ापे में इतनी फजीहत होगी, यह इन्होंने सपने में भी नही सोचा था,
इन्हें भी मुख्यमंत्री अखिलेश द्वारा कैबिनेट मंत्री के पद से सीधे बर्खास्त कर दिया गया!!!!!😢😢

8---एमएलसी आनन्द भदौरिया----
एक युवा राजपूत नेता जिसे मायावती सरकार में सपा के धरने प्रदर्शन में भाग लेने के कारण बसपाई पुलिस द्वारा निर्ममता से सरेआम पीटा गया था,
उन्हें सपा सरकार में अपने बलिदान का ये सिला मिला कि शिवपाल यादव ने इन्हें समाजवादी पार्टी से ही निकाल कर बाहर कर दिया!!!

9--योगेश प्रताप सिंह---
गोंडा के प्रभावी राजपूत नेता योगेश प्रताप सिंह को भी अखिलेश यादव ने मन्त्रीमण्डल से बर्खास्त कर दिया
😢😢

10--बृजभूषण शरण सिंह---
सपा हाईकमान की बेरुखी और उपेक्षा से नाराज होकर सांसद बृजभूषण शरण सिंह बीजेपी में दोबारा शामिल हो गए।।

11--जगदीश सिंह राणा-----
शिवपाल यादव द्वारा पहले सैफई महोत्सव में सहारनपुर के लोकप्रिय  और कद्दावर नेता जगदीश सिंह राणा जी (पूर्व सांसद और पूर्व कैबिनेट मंत्री ) को बुलाकर सपा में दोबारा आने का निमन्त्रण दिया,
राज्यसभा और विधानपरिषद में भेजने का भी आश्वासन दिया,
पर बाद में मुकर गए,
सैफई महोत्सव में जाने के कारण बसपा ने राणा जी और उनके भाई विधायक महावीर सिंह को निष्कासित कर दिया,
अब राणा परिवार बीजेपी में शामिल हो गया है।।

12--पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर---
सपा सरकार बनने के बाद नीरज शेखर की भी सपा सरकार में जमकर उपेक्षा की गयी,इनके परिवार के सदस्यों को एमएलसी चुनाव भी मजबूरन बसपा से लड़ना पड़ा,
बाद में पूर्वांचल में स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के अनुयायी राजपूत वोटों के लालच में बेमन से इन्हें राज्यसभा में भेजा गया।।

इस प्रकार समाजवादी पार्टी में राजपूत नेताओं की कितनी फजीहत हुई इसका अंदाजा लगाया जा सकता है,
किसी राजपूत नेता को अखिलेश का कोपभाजन बनना पड़ा, तो किसी पर शिवपाल यादव की गाज गिरी, किसी को सीधे मुलायम सिंह ने ही लपेट दिया,

इस दौरान लगातार अपने बयानों और क्रियाकलाप से सरकार को संकट में डालने वाले नेताओं आजम खान, अतीक अहमद, मुख़्तार अंसारी जैसे किसी मुस्लिम नेताओ का कभी बाल भी बांका नही हुआ,
न किसी अहीर नेता का नुक्सान हुआ,
गाज गिरी तो राजपूतो पर!!!!

जबकि 2012 में सपा के टिकट पर 30 से ज्यादा राजपूत विधायक जीतकर आए थे, इस बार तो टिकट ही 25 के आसपास मिले हैं!!!!

"पराएधीन सपनेहुँ सुख नाही" 😢😢😢😢
सिर्फ सामन्त बनकर सत्ता सुख भोगने की चाहत रखने वाले स्वार्थी राजपूत नेताओं के लिए यह तिरस्कार एक बड़ा सबक है।।

दोस्तों, गलती सपा की नही बल्कि इसपर भरोसा करने वाले राजपूतो की है,
ये वही पार्टी है जिसने गरीब राजपूत किसानो की हत्यारिन फूलन देवी को रिहा किया और सांसद बनाकर राजपूत समाज की अस्मिता को ठेंगा दिखाया था, यह वही दल है जिसकी सरकार ने अयोध्या में सूर्यवंशी क्षत्रिय भगवान श्रीराम के भक्तों पर गोलियां चलवाई थी,

यह वही सपा है जिसकी सरकार में उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के सैंकड़ो आंदोलनकारियों (जिनमे ब्राह्मण राजपूत अधिक थे) पर निर्ममता से रामपुर तिराहा पर गोलिया चलवाई गयी थी और ओरतो के साथ बलात्कार तक हुए थे,

पिछले 5 साल में राजपूतो के बच्चों को न पर्याप्त नोकरिया मिली  न स्कुल कॉलेज में एडमिशन मिले,
लाखो राजपूत युवा बेरोजगार बने घूम रहे हैं 😢😢😢😢
और कुछ राजपूत नेता निजी स्वार्थ में सपा में सामन्त बनकर सत्ता सुख भोग रहे थे, अब अपमानित हो रहे हैं!!!

एक बार सपा नेता बेनीप्रसाद वर्मा ने कहा था कि आरक्षण विरोधियो से डंडे लेकर निपटा जाएगा!!!!

तो खाओ भाइयो डंडे और सहो अपमान ,तिरस्कार और बेइज्जती!!!!

जय राजपूताना 😷😷😷😷😷😷😷😷

Friday, December 2, 2016

नोटबन्दी का मूल उद्देश्य अब विफल होता दिख रहा है, जिम्मेदार कौन???

क्या विफल गया नोटबन्दी का मूल उद्देश्य?--------

नोटबन्दी का मूल उद्देश्य काले धन पर प्रभावी रोकथाम और केंद्रीय राजस्व में भारी वृद्धि करना था,
किन्तु यह मूल उद्देश्य विभिन्न कारणों से पूरा होता हुआ नही दिख रहा है।

दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक जितनी कीमत के नोट छापकर जारी करती है उसकी कीमत के बराबर सोना रिजर्व में रखता है,उस सोने के मान के कारण ही हर करेंसी पर लिखा होता है कि "मैं धारक को __रूपये अदा करने का वचन देता हूँ।।

जानकारी मिली है कि 500₹ और 1000₹ के नोट के रूप में रिजर्व बैंक द्वारा करीब 16 लाख करोड़ रूपये की करेंसी जारी की थी,
नोटबन्दी करते हुए मूल सोच यह थी कि जिनके पास 500₹ और 1000₹ के नोट के रूप में काला धन होगा वो उसे घोषित कर बैंको में जमा करवाने का जोखिम नही उठाएंगे, और उसे नष्ट कर देंगे या 30 दिसम्बर के बाद वो स्वत नष्ट हो जाएगी।

प्रारम्भ में अनुमान लगाया गया था कि नोटबन्दी के निर्णय के बाद उक्त 16 लाख करोड़ की करेंसी में से लगभग 25% यानि करीब 4 लाख करोड़ की करेंसी बैंको में वापस नही आएगी।

चूँकि उस करेंसी के बराबर रिजर्व बैंक के पास सोना उपलब्ध है इसलिए रिजर्व बैंक उतने ही मूल्य के नए नोट छाप सकेगा वो भी बिना मुद्रा स्फीति बढ़ाए हुए।
यह अनुमानित 4 लाख करोड़ की धनराशि रिजर्व बैंक का शुद्ध लाभ होता और रिजर्व बैंक इसे राष्ट्रीय आय घोषित कर देता जैसा की पहले से तय था।।

इसके अतिरक्त बैंको में जो धनराशि जमा हुई है उनमे पेनल्टी आदि लगाने से आयकर के रूप में करीब 50 हजार करोड़ रूपये के अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति का भी अनुमान है जो पूरा हो सकता है।

किन्तु मूल उद्देश्य विफल क्यों हुआ????
मूल उद्देश्य विफल इसलिए हो गया क्योंकि नकदी के रूप में काला धन रखने वालो ने विभिन्न जुगत भिड़ाकर या तो बैंक अधिकारियो की मिलीभगत से अपने नोट बदलवाकर नई करेंसी प्राप्त कर ली, या सोने इत्यादि में निवेश कर लिया।।

अधिकतर राजनेताओं के पेट्रोल पम्प और गैस एजेंसी हैं जिनमे  जान बूझकर पुरानी अमान्य करेंसी जारी रखी गयी जिससे पेट्रोलपंप, गैस एजेंसी, ट्रांसपोर्टर, परिवहन विभाग के माध्यम से बड़ी मात्रा में 500₹ और 1000₹ की नकदी के रूप में उपलब्ध काला धन ठिकाने लगा दिया गया।।

रही सही कसर कुछ बैंककर्मियो ने पूरी कर दी जो आम जनता को पुरे दिन लाइन में खड़ा रखकर कैश खत्म होने की घोषणा कर देते हैं और चोर दरवाजे से बड़ी मछलियो की पुरानी करेंसी को बदलकर नए नोट उन्हें उपलब्ध करवा रहे हैं।

अब हालत यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा जारी 16 लाख करोड़ की पुरानी करेंसी (500/1000₹ के नोट के रूप में) में से करीब 4 लाख करोड़ पहले से बैंको में जमा था, शेष 12 लाख करोड़ जो नागरिको पर सफेद या काले धन के रूप में उपलब्ध था, नोटबन्दी के एक माह पूरा होने से पहले ही उसमे से 9 लाख करोड़ बैंको में जमा भी हो चूका है,
और शेष 3 लाख करोड़ में से भी अधिकांश धनराशि 30 दिसम्बर तक किसी न किसी रूप में आ ही जाएगी,

जिसका साफ़ अर्थ है कि भारतीय रिजर्व बैंक जो कई लाख करोड़ के लाभ की उम्मीद में था, वो उद्देश्य अब विफल होता दिखाई दे रहा है।
इस आय से देश पर विदेशी कर्जो को चुकाया जा सकता था,और कई जनकल्याणकारी योजनाएं लागु की जा सकती थी पर अब ऐसा होता नही दिख पा रहा है।

अतिरिक्त आयकर के रूप में जो राजस्व मिलेगा भी वो भी इस निर्णय से हुए लघु मध्यम उद्योगों में तालाबन्दी, बेरोजगारी, मन्दी, कम बिक्री से जो विभिन्न कर राजस्व में कमी आएगी उसकी तुलना में बेकार सिद्ध होगा, इसी कारण अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों द्वारा भी भारत की जीडीपी व्रद्धि दर का अनुमान घटा दिया गया है,
माना जा रहा है कि इस निर्णय से आई मन्दी से भारत की जीडीपी वृद्धि दर में 2% की भारी गिरावट होगी जिससे देश में अचानक से बेरोजगारी और अव्यवस्था फ़ैल सकती है और उत्पादन भी ठप हो सकता है।।
आज एक महीना बाद भी करोड़ो देशवासी बजाय मेहनत मजदूरी करके उत्पादन करने के बैंक/एटीम की लाइन में लगे हुए हैं।
निम्न मध्यम वर्ग ,छोटे दुकानदारो मध्यम व्यापारियो को चोर की दृष्टि से देखा जा रहा है जबकि किसी भृष्ट राजनेताओ माफियाओ का बाल भी बांका नही हो पाया है।

और अब निर्णय असफल होता देखकर कैशलेस इकॉनोमी का जुमला दिया जा रहा है, ऑनलाइन ट्रांसेक्शन, फंड ट्रांसफर, पेटीएम आदि के द्वारा पूर्ण क्रांति की बात उस देश में की जा रही है जहाँ आज भी 40% आबादी अनपढ़ है।
कुल मिलाकर कोई अंधभक्त चाहे जितनी मर्जी जयजयकार करे किन्तु यह शानदार और उचित निर्णय था जिसे लागू करने में इतनी घोर लापरवाही बरती गयी कि इस निर्णय का मूल उद्देश्य ही विफल होता दिख रहा है।इस लापरवाही के जिम्मेदार वित्तमंत्री अरुण जेटली और आरबीआई गवर्नर हैं।

मैं भले ही मोदीभक्त नही हूँ किन्तु राष्ट्रभक्त अवश्य हूँ, मोदी जी का और उनके इस निर्णय का प्रशंसक भी हूँ।
किन्तु नोटबन्दी के राष्ट्रहित के निर्णय का निकृष्ट कोटि के क्रियान्यवयन होने से इसका मूल उद्देश्य ही विफल हो गया है। जिसका मुझे दुःख है।

Thursday, November 17, 2016

अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो इन दो नम्बर के धंधो का क्या होगा ????😂😂

अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो इन दो नम्बर के धंधो का क्या होगा---

चर्चाओं के अनुसार अगर जल्द ही देश में 3 हजार से ऊपर के नकद लेन देन पर रोक लग गयी, इससे ऊपर सभी लेन देन चैक/डेबिट-क्रेडिट कार्ड/ account to account money transfer से होने लगेऔर सोना सरकारी खजाने में जमा करवाकर नागरिकों को गोल्ड बांड दे दिए गए, तो जनता के पास सिर्फ सब्जी, फल, बिस्कुट-नमकीन खरीदने या चाट पकोड़ी खाने के ही नकद पैसे होंगे,

ऐसी दशा में ये धन्दे कैसे चलेंगे???
1--रिश्वत
2--कमीशन
3--फिरौती
4--डकैती/लूटमार/राहजनी
5--रंगदारी
6--आरटीआई एक्ट के नाम पर वसूली/ब्लैकमेलिंग
7--हफ्ता/महीना वसूली
8--प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के पत्रकारों द्वारा राजनैतिक दलों, माफियाओ,नोकरशाहों से हिस्सा वसूली
9--अनधिकृत ब्याज का धन्दा
10--पेटी ठेकेदारी (रजिस्टर्ड ठेकेदार के नीचे)
11--प्रॉपर्टी सौदों में कमीशन-दलाली (बिना पंजीकरण)
12--गुंडागर्दी/बाहुबलीपना/लठैती/नेताओं के साथ हथियार लेकर चलने वाले चमचे
13--शराब माफिया/खनन माफिया/वन माफिया और तस्कर
14--स्कुल-कॉलेजो में लाखो करोड़ो का डोनेशन
15--धर्मान्तरण, मदरसों मिशनरियों ढोंगी मठों के क्रियाकलाप
16--भृष्ट एनजीओ
17--आतंकवाद,नक्सलवाद,
18--हवाला ,सट्टा -खाईबाड़ी, मैच फिक्सिंग
19--पशु तस्करी, गौहत्या,
20--छुटभैया नेतागिरी 

इन जैसे सब धंदो की बसन्ती फिट हो जाएगी अगर नकद लेन देन बन्द हो गया तो,
क्योंकि उपरोक्त में से कोई भी धंदेबाज अपनी  राशि अपने या अपने परिचित के खाते में प्राप्त करने की हिम्मत नही करेगा!!!!
इसलिए जो भी भाई इन धंधो से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं वो अपना दूसरा रोजगार ढूंढने में लग जाएं नही तो भूखे मर जाओगे।।

हाँ अम्बानी अडानी जैसो का धंधा पहले की तरह चलता फलता फूलता रहेगा क्योंकि ये नकद की बजाय चोर दरवाजों से बड़े राजनेताओं/ बड़े नोकरशाहों को शेयर आदि बांटकर अपना और उनका काला धन सफेद करते ही रहेंगे..