Friday, October 20, 2017

19 वीं सदी के 10 सबसे महान भारतीय यौद्धा कौन थे??


19 वीं सदी के सबसे महान भारतीय यौद्धा और विजेताओं की सूचि क्रमानुसार---

1--शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह--
(जाति--सांसी सिक्ख)

इस युग में सबसे बड़ा साम्राज्य,जिसे उनके जीवित रहते हुए अंग्रेज भी छू तक नही पाए।

2--महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति सरदार हरिसिंह नलवा--
(जाति--उप्पल खत्री सिक्ख)

अफगानों को उनके घर में घुसकर मार लगाने वाले
और खैबर दर्रे का मुँह हमेशा के लिए बन्द करने वाले शूरवीर यौद्धा, जिनसे पठान बुरी तरह से भयभीत थे।


3--इंदौर के महाराजा यशवन्त राव होल्कर---

(जाति--धनगर गड़रिया)

एक ऐसा शूरवीर जिसे उस समय अंग्रेज अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे, और उससे किसी भी शर्त पर समझोता करने को राजी थे,

एक ऐसा महानायक जिसका साथ पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह देते, दौलतराव सिंधिया और अमीर खान पिंडारी उनके साथ विश्वासघात न करते और भरतपुर का जाट राजा उनका साथ छोड़कर अंग्रेजो से न मिल जाता,
तो यशवन्त राव होल्कर का अगला निशाना कलकत्ता होता और अंग्रेजो को उसी समय भारत छोड़कर जाना पड़ता!!
ऐसा शूरवीर मात्र 35 वर्ष की आयु में स्वर्ग सिधार गया!!!!

4--जम्मू कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह---
(जाति--डोगरा जमवाल राजपूत)

अपने शौर्य और सूझबूझ के साथ जम्मू कश्मीर रियासत की स्थापना की, गिलगित बाल्टिस्तान के पठानों का बड़ी निर्दयता के साथ दमन करके उन्हें उन्ही की भाषा में कड़ा सबक सिखाया।
एक ऐसे क्षेत्र में हिन्दू राजपूत राज्य स्थापित किया जहाँ 75% आबादी मुस्लिमो की थी।

5--जनरल जोरावर सिंह कल्हुरिया---
(जाति--चन्देल राजपूत)

महाराजा गुलाब सिंह के सेनापति जनरल जोरावर सिंह की गणना भारत के सर्वकालीन महान सेनानायकों में की जाती है।
बडे बड़े दुरूह बर्फीले पहाड़ो को पार करके तिब्बत,लद्दाख,गिलगित-बाल्टिस्तान तक का इलाका महाराजा गुलाब सिंह के राज्य में जोड़ने वाले जनरल जोरावर सिंह को भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

भारतवर्ष और जम्मू कश्मीर की आधुनिक सीमाएं जनरल जोरावर सिंह की शूरवीरता की सदैव ऋणी रहेंगी।

6--जगदीशपुर बिहार के बाबू कुंवर सिंह----
(जाति--परमार राजपूत)


80 वर्ष की आयु में शक्तिशाली अंग्रेजो को जगदीशपुर बिहार से लेकर लखनऊ तक एक हजार किलोमीटर के क्षेत्र में जमकर मार लगाने वाले बाबू कुंवर सिंह जी 1857 की क्रांति के निर्वविवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ यौद्धा थे।

यदि क्रांति के समय उनकी आयु 50 वर्ष से कम होती तो देश का इतिहास कुछ और ही होता।

7--नेपाल के भीमसेन थापा और उनके पौत्र जंगबहादुर राणा---
(जाति--क्षेत्री ,जो पहाड़ी खस जनजाति+ भारतीय क्षत्रियों+ मंगोलॉयड जनजातियों का मिक्स ब्रीड समाज है)

इनके समय में नेपाल साम्राज्य की विजय पताका पश्चिम में सतलुज नदी और सुदूर पूर्व में सिक्किम दार्जलिंग व् तीस्ता नदी से जा मिलती थी।

आज का गढ़वाल, कुमायूं, सिरमोर, कांगड़ा तक जीतते हुए नेपाल का गोरखा साम्राज्य एक समय आश्चर्यजनक रूप से पंजाब की सरहद तक पहुंच गया था।

8--महारानी लक्ष्मीबाई---
(जाति--मराठी ब्राह्मण)


झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की महान वीरांगना थीं।
उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में अंग्रेज़ साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की किन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

9--तांतिया टोपे----
(जाति--मराठी ब्राह्मण)
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख सेनानायक थे। सन १८५७ के महान विद्रोह में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण, प्रेरणादायक और बेजोड़ थी।

10--स्वतन्त्रता संग्राम 1857 के अन्य सभी बड़े यौद्धा संयुक्त रूप से नाना साहिब, राणा बेनीमाधव सिंह बैस जी, आउवा ठाकुर कुशाल सिंह, बख्त खान, बेगम हजरत महल, आदि सैंकड़ो वीर क्रांतिकारी शामिल हैं।

1857 से भी पहले अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने वाले वजीर रामसिंह पठानिया और
अंग्रेजो के विरुद्ध सशस्त्र आदिवासी आंदोलन के महानायक बिरसा मुंडा का नाम भी सूचि में शामिल किया जा सकता है।

उपरोक्त विचार मेरे व्यक्तिगत हैं किसी पर बाध्यकारी नही हैं।

Sunday, March 19, 2017

योगी मंत्रीमंडल में ठाकुरों का वर्चस्व सम्बन्धी मीडिया के दुष्प्रचार का वायरल सच

जय श्रीराम भाइयों---
कुछ समाचार पत्र और कुछ हमारे ही बंधू योगी आदित्यनाथ जी के मंत्रीमंडल पर जातिगत आधार पर दुष्प्रचार कर रहे हैं कि इसमें ठाकुरों का वर्चस्व रहा है
कुछ हमारे बधु भी अज्ञानतावश खूब लम्बी लम्बी हाँक रहे हैं
ऐसे सभी मिडिया के बन्धु और वो राजपूत लक्डबग्घे जान लें कि---

योगी जी के मन्त्रीमण्डल में 44 में से कुल 7 मंत्री ठाकुर बने हैं जो कुल संख्या का 16% है
जबकि बीजेपी के विधायको 325 की कुल संख्या का 18% राजपूत विधायक (56) हैं

इसके अलावा
अखिलेश सरकार में राजपूत मंत्री थे 10-12
मायावती सरकार में भी राजपूत मंत्री थे 8-10
मुलायम सरकार में राजपूत मंत्री थे 21
राजनाथ सरकार में राजपूत मंत्री बने थे 19
कल्याण सिंह सरकार में राजपूत मंत्री थे 19

तो आज योगी जी की सरकार में मात्र 7 ठाकुर मंत्री बन गए तो इतनी हाय तौबा क्यों????

सच्चाई ये है कि मुलायम अक्ललेश मायावती सरकारों में कुछ को छोड़कर अधिकांश राजपूत मंत्री एकदम पंगु थे किसी काम के नही थे, मामूली से अहीर दलित अधिकारी ही उनकी बेइज्जती कर देते थे (आँखों देखी)
अब सुरेश राणा, मोती सिंह जैसे प्रभावी मंत्री उनसे लाख दर्जे बेहतर सिद्ध होंगे।

सिर्फ संगीत सोम के साथ अन्याय हुआ, उन्हें दो सप्ताह बाद अगले विस्तार में सम्मानजनक स्थान अवश्य मिलेगा,
बाकि योगी मन्त्रीमण्डल संतुलित और शानदार है।सभी वर्गों को समुचित स्थान मिला है।
गूजरों को मन्त्रीमण्डल में स्थान नही मिला इसके पीछे यूपी के सबसे ताकतवर गूजर नेता का हाथ है क्योंकि गूजर कोटे से वो अपनी बेटी को कुछ दिन बाद एमएलसी बनवाकर मंत्री बनवाना चाहते हैं इसलिए अब किसी और को बनने नही दिया।

योगी जी संत हैं, उनका समाज सर्वसमाज है , हमे उनसे जातिवादी शासन या वर्चस्व नही एकदम निष्पक्ष शासन की उम्मीद है और हमारी उम्मीद पूरी होगी
उनके मन्त्रीमण्डल को लेकर जातिगत दुष्प्रचार बन्द हो।

सामाजिक आधार पर संतुलित रहा योगी मंत्रीमंडल, पर संगीत सोम के साथ घोर अन्याय हुआ

कैबिनेट मंत्री---

1--जयप्रताप सिंह डुमरियागंज जिले की बांसी सीट से विधायक
2--चेतन चौहान अमरोहा जिले को नोगाँव सादात सीट से विधायक
3--राजेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ मोती सिंह प्रतापगढ़ जिले की पट्टी सीट से विधायक

राज्यमंत्री स्वतन्त्र प्रभार
4--सुरेश राणा शामली की थानाभवन सीट से विधायक
5--स्वाति सिंह लखनऊ की सरोजनीनगर सीट से विधायक
6--डॉक्टर महेंद्र सिंह विधान परिषद सदस्य

राज्यमंत्री
7---रणवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ़ धुन्नी सिंह फतेहपुर जिले की हुसैनगंज सीट से

सिर्फ 7 मंत्री राजपूत बने, जिनमे मात्र 3 कैबिनेट मंत्री बने,
अखिलेश सरकार में 10 कैबिनेट मंत्री और 2 राज्यमंत्री राजपूत थे
बसपा सरकार में 4 कैबिनेट मंत्री और 6 राज्यमंत्री राजपूत थे।
कल्याण सिंह सरकार में 16 मंत्री राजपूत थे
मुलायम सरकार में 21 मंत्री राजपूत थे

गत 40 वर्षों में सबसे कम राजपूत मंत्री इस बार बनाए गए,

उप मुख्यमंत्री समेत 17 OBC, 6 SC, 7 क्षत्रिय ,8 ब्राह्मण, 8 कायस्थ-वैश्य-खत्री, 2 जाट और 1 शिया मुस्लिम ,1 सिक्ख जाट की UP मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी है।
गूजर ,त्यागी शून्य रह गए।

यही नही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय हिन्दू शेर संगीत सोम का नाम कैबिनेट मंत्री पद से देश के सबसे बड़े राजपूत नेता ने दबाव डालकर कटवाया!!!!!!!!!!!
बेहद शर्मनाक

यही नही उस बड़े कद के तथाकथित महान राजपूत नेता ने अपनी छवि चमकाने के चक्कर में अपने पुत्र का नाम भी मंत्रीमंडल से कटवा दिया!!!!
पश्चिम उत्तर प्रदेश मेरठ सहारनपुर मंडल से एक भी कैबिनेट मंत्री नही बनाया गया!!!!

सुरेश राणा जी को भी मात्र राज्यमंत्री (स्वतन्त्र प्रभार) बनाया गया !!!!

योगी जी को अगले विस्तार में शीघ्र संगीत सोम को कैबिनेट में जगह देनी चाहिए, और सुरेश राणा जी को प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बनाया जाए।
अभी संगीत सोम के साथ बड़ा अन्याय किया गया है।

हिन्दू हृदय सम्राट योगी आदित्यनाथ जी मुख्यमंत्री बने हमारे लिए यही पर्याप्त है।मंत्री चाहे कम बने हों कोई दिक्कत नही।
बस संगीत सोम के साथ अन्याय हुआ जो अगले मन्त्रीमण्डल विस्तार में सुधार होना चाहिए।

सपा बसपा सरकारों में राजपूत मंत्रियो को मामूली अहीर या दलित मुस्लिम डीएम एसपी हड़का तक देते थे सिर्फ अहीर दलित और मुस्लिम नेताओं की चलती थी।

आदरणीय सुरेश राणा जी को राज्यमंत्री (स्वतन्त्र प्रभार) बनाए जाने पर  और सभी मंत्रियों को शपथ लेने पर हार्दिक बधाई।

Saturday, March 18, 2017

मोदी-अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के 2 करोड़ राजपूतों को ठेंगा दिखाया!!!, आक्रोश की लहर

मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने राजपूतो के साथ छल किया----

मोदीभक्त न होते हुए भी मैंने अपने साथियों के साथ मिलकर पिछले 6-7 माह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी का समर्थन किया, इसके कुछ कारण हैं।

1--क्योंकि राजपूत स्वभाव से राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी होता है इसलिए बीजेपी हम सबकी स्वाभाविक पसन्द बनी,
भले ही बीजेपी का हिंदुत्व किसी जुमले से अधिक न हो,पर आप सबके साथ मेरा भी बीजेपी को हमेशा से समर्थन करने का प्रमुख कारण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व रहा।

2--विशाल जनसंख्या होने के बावजूद राजपूत समाज पिछले 70 वर्षों से उत्तर प्रदेश की शीर्ष सत्ता से दूर रहा है , सत्ता सुख से हम सदैव वंचित रहे हैं,बीच में कोई राजपूत मुख्यमंत्री बना भी तो उसे टिकने नही दिया गया!!
प्रारम्भ में ब्राह्मण और बाद के दिनों में अहीर/दलित/मुस्लिम उत्तर प्रदेश के शासक वर्ग रहे और हम मंत्री-संत्री बनकर इनकी चाकरी ही करते रहे,

सपा बसपा और उनके समर्थक वर्ग क्षत्रियों के स्वभाविक  शत्रु हैं उन्होंने क्षत्रियों को सूबेदारी तो दी पर सम्मान नही मिला, सपा बसपा और उनकी सरकारों में अहिरो दलितों मुस्लिमो का वर्चस्व भी हम सबका बीजेपी को समर्थन के लिए प्रमुख कारक रहा।

3--सपा बसपा सरकारों में भी हमें मंत्री संत्री पद खूब मिले ,पर मान सम्मान नही मिला,
वहां कभी हमे शीर्ष सत्ता (मुख्यमंत्री पद) मिलना सम्भव नही था जो उत्तर प्रदेश में हमारे लिए प्राणवायु की भांति बेहद जरूरी है

वर्षों से शीर्ष सत्ता से अलग थलग रखे गए राजपूत समाज ने योगी आदित्यनाथ/राजनाथ सिंह की सीएम उम्मीदवारी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को जबरदस्त और एकतरफा समर्थन दिया।

आप आंकड़ो में स्वयं देखिये ,उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सर्वाधिक समर्थन क्षत्रिय समाज ने किया,
बीजेपी को मिले 40% कुल मतों में एक तिहाई समर्थन सिर्फ राजपूतो के दम पर मिला,
राजपूत समर्थन न देते तो कितनी भी बड़ी लहर होती बीजेपी 25% पर सिमट जाती!!

बीजेपी के विजयी विधायको में सर्वाधिक संख्या 56 राजपूतो की ही है,राजपूतो ने बीजेपी के चक्कर में दूसरे दलों से खड़े दर्जन भर मजबूत राजपूत उम्मीदवारों को हरवा दिया नही तो यूपी विधानसभा में राजपूत विधायको की संख्या 80 के पार होती।

आज मोदी अमित शाह की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश की जीत में राजपूतों का योगदान पूरी तरह से नकार दिया है तो ऐसा लग रहा है मानो इतने दिन से हम दूसरों के खेत में हल चला रहे थे,
हमारा तो कुछ था ही नही जिसके लिए हम लड़ रहे थे!!!!

दशकों से शीर्ष सत्ता की बाट जोह रहे क्षत्रिय समाज के साथ मोदी जी ने छल किया है और हमारी भावनाओं का दोहन कर हमे नींबू की तरह रस निचोड़कर कूड़ेदान में फेक दिया है ऐसा प्रतीत होता है।

इस धोखे का प्रतिकार अवश्य होगा, समय आने पर
👊👊
राजपूतो का चरित्र है कि हम दुश्मनी नही भूलते, चाहे बदला लेने का मौका लम्बे समय बाद ही मिले।

हम बीजेपी की हवा बना सकते हे तो हवा निकाल भी सकते हे ।
हर बार हम अपने अरमानो की हत्या करके मन मसोस कर बैठ जाते हे ,
अब इससे ज्यादा सहा नही जाता भाड़ में जाए ऐसा राष्टवाद जिसकी बलि का बकरा हर बार राजपूत बने...😬😬

मोदी-अमित शाह की जोड़ी का दिया घाव सीने में बहुत अंदर तक असर कर गया है,
घाव दिया है तो लहू भी टपकेगा
याद रखना मोदी जी, क्षत्रिय का लहू असर जरूर दिखाएगा।

हर हर महादेव

Monday, March 13, 2017

शीर्ष सत्ता (मुख्यमंत्री पद) के अभाव में मात्र सूबेदारी तक सिमित रहा यूपी का क्षत्रिय समाज----


स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत उत्तर प्रदेश में बने मुख्यमंत्रियों का विवरण-----

1--गोविन्द वल्लभ पन्त (ब्राह्मण) 8 वर्ष
2--बाबु सम्पूर्णानन्द (कायस्थ) 3 वर्ष
3--चन्द्रभानु गुप्ता(वैश्य) 4 वर्ष
4--सुचेता कृपलानी (ब्राह्मण) 4 वर्ष
5--चौधरी चरण सिंह (जाट) 2 वर्ष
6--त्रिभुवन नारायण सिंह(राजपूत) 7 महीना
7--कमलापति त्रिपाठी(ब्राह्मण) 2 वर्ष
8--हेमवती नन्दन बहुगुणा (ब्राह्मण)2 वर्ष
9--नारायण दत्त तिवारी(ब्राह्मण)4 वर्ष
10--रामनरेश यादव (अहीर) 2 वर्ष
11--बनारसी दासगुप्त (वैश्य) 1 वर्ष
12--वीपी सिंह (राजपूत) 1 वर्ष 10 माह
13--श्रीपति मिश्र (ब्राह्मण) 2 वर्ष
14--वीर बहादुर सिंह (राजपूत) 3 वर्ष
15--मुलायम सिंह यादव (अहीर) 7 वर्ष
16--कल्याण सिंह (लोधी ओबीसी) 4 वर्ष
17--मायावती (दलित ) 8 वर्ष
18--रामप्रकाश गुप्ता (वैश्य) 1 वर्ष
19--राजनाथ सिंह (राजपूत) 1 वर्ष 5 महीना
20--अखिलेश यादव (अहीर)5 वर्ष

ब्राह्मण (जनसंख्या 11%)---

कुल 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री 22 वर्ष यूपी में मुख्यमंत्री रहे।।इनके कार्यकालों में अधिकतर सरकारी नोकरियों और शासन प्रशासन में ब्राह्मणों का बोलबाला रहा।

अहीर(जनसंख्या 9%)---

कुल 3 अहीर मुख्यमंत्री 12 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे।
मुलायम सिंह यादव और अखिलेश के कार्यकाल में हर सरकारी भर्ती में अहीरों को जमकर प्राथमिकता मिली, कई लाख अहीरों को सरकारी सेवाओं में भर दिया,हर मलाईदार पदों पर अहीर बिठा दिए,
सरकारी ठेको, खनन आदि में अहीरों का ही बोलबाला रहा।
इन 12 वर्षों में अहीरों का सर्वांगीण विकास हुआ और वो यूपी में सर्वोच्च स्थिति में पहुंच गए
मुस्लिम और राजपूत इनके छोटे मोटे सूबेदार मात्र बनकर रह गए।

वैश्य(जनसंख्या 3%)---
कुल 3 वैश्य 6 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे

जाटव दलित (जनसंख्या 13%)----

अकेले मायावती 8 वर्ष तक यूपी की मुख्यमंत्री रही ,इन 8 वर्षों में मायावती ने अपनी जाति जाटव को सबल बना दिया, इनका कार्यकाल दलितों के वर्चस्व और स्वर्णो की गुलामी का कार्यकाल था जिसमे सर्वाधिक उत्पीड़न राजपूतों का हुआ था।

क्षत्रिय (जनसंख्या 15% )---

यूपी क्षत्रिय बाहुल्य प्रदेश है यहाँ 10% मुख्यधारा के राजपूत और 5% राजपूतो से सम्बंधित अलग अलग समाज यूपी में बिखरे हुए हैं जो राजपूतो के साथ ही मिलकर वोटिंग करते हैं
पर यूपी की सबसे बड़ी जाति क्षत्रिय 15% जनसंख्या के बावजूद शीर्ष सत्ता से वंचित रही है।
कुल 4 राजपूत बेचारे मात्र 6 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे, वो भी टुकड़ों के कार्यकाल में, इनमे भी वीरबहादुर सिंह के 3 वर्ष और राजनाथ सिंह के डेढ़ वर्ष ही क्षत्रिय समाज को सत्ता सुख मिल पाया।

लोधी(जनसंख्या 3%)--
अकेले कल्याण सिंह 4 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे,एक समय बेहद पिछड़ी हुई लोधी जाति कल्याण के कार्यकाल में उभर गयी।

कायस्थ(जनसंख्या 1%)----
बाबु सम्पूर्णानन्द 3 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे।

जाट (जनसंख्या 1.7%)----

जाट समाज से चौधरी चरण सिंह 2 बार में 2 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे।चौधरी चरण खुद सीएम रहे या उनके समर्थन से कोई अन्य बना ,
उन्होंने छोटे से कार्यकाल में जाटों को पुलिस, पीएसी, कृषि विभाग और अन्य सरकारी नोकरियों में भर दिया जिसका लाभ जाट समाज अब तक उठा रहा है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछले 70 वर्षों में सभी राजनैतिक दलों ने राजपूत समाज के साथ छल किया है,
हमे सिर्फ सूबेदारी मिली, सर्वोच्च सत्ता कभी कभार मिली, वो भी टुकड़ों के कार्यकाल में जिसका कोई महत्व नही।

सर्वोच्च सत्ता जिन समाजो को मिली उन्होंने अपना भरपूर विकास किया,वहीँ राजपूत समाज मात्र टुच्ची सूबेदारी (मंत्री/संत्री/विधायक/सांसद पद)ही प्राप्त कर पाया!!!

सर्वोच्च सत्ता के अभाव् में और सत्तासीन लोगो की उपेक्षा के चलते यूपी और बिहार का राजपूत समाज बुरी तरह पिछड़ चुका है।

इस बार यूपी में सबसे ज्यादा दिलोजान से किसी समाज ने बीजेपी को एकजुट होकर मतदान किया है तो वो राजपूत समाज है जिसने न सिर्फ अपना वोट दिया बल्कि बच्चे बच्चे ने बीजेपी का कार्यकर्ता बनकर अन्य समाज के भी वोट दिलवाए,

नरेंद्र मोदी जी के बाद यूपी में बीजेपी की हवा बनाने में सबसे बड़ा योगदान योगी आदित्यनाथ और राजनाथ सिंह की जनसभाओं का है,
आज जब बीजेपी सत्ता में आती दिख रही है तो मुख्यमंत्री पद के लिए कुछ लोग योगी जी और राजनाथ का नाम एकदम ख़ारिज करते हुए किसी सुनील बंसल, रामलाल, श्रीकांत शर्मा,मनोज सिन्हा, सिद्धार्थनाथ, स्मृति ईरानी, सतीश महाना, सुरेश खन्ना आदि का उल्लेख कर रहे हैं

कौन हैं ये लोग????
ये इतने ही काबिल थे तो योगी जी और राजनाथ को पूरे प्रदेश में धक्के खिलाने की बजाय इनकी जनसभाएं क्यों नही करवाई गयी???

योगी और राजनाथ बेचारे जाति से राजपूत हैं इसलिए इनका योगदान नकारना कुछ कथित राष्ट्रवादियो के लिए बड़ा आसान है !!!!

मुझे ऐसा लग रहा है कि निस्वार्थ भाव से राष्ट्रवादी भावना से ओतप्रोत होकर वोट करने वाले हमारे राजपूत समाज के साथ फिर से धोखा जरूर होगा।

ऐसा हुआ तो 2019 अधिक दूर नही है, लोकसभा चुनाव से पहले सपा, कांग्रेस, बसपा, रालोद में गठबंधन होगा जिनका कुल मत प्रतिशत 52% तक पहुंच जाएगा।और बीजेपी 40% पर सिमित रह जाएगी।

तब वो होगा जो आज असम्भव लगता है ,बिहार की तरह ही यूपी में भी यही हाल होगा।

सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक क्षमता देखी जाए तो राजनाथ सिंह सर्वश्रेष्ठ हैं
वहीँ जनभावनाएं या राष्ट्रवादी एजेंडा लागु करने की बात करें तो योगी आदित्यनाथ को सर्वहिन्दु समाज का समर्थन हासिल है।

जनभावनाओं का अपमान हुआ तो 2019 अधिक दूर नही हैं, तब हो सकता है हम भी बदली हुई भूमिका में दिखाई दें।

योगी जी हम सबकी प्राथमिकता हैं, पर उनकी कट्टर छवि को देखते हुए मोदी अमित शाह उन्हें सीएम नही बनाते हैं तो सर्वश्रेष्ठ प्रशासक राजनाथ सिंह को यूपी का सीएम बनाया जाए,
राजनाथ सिंह इसके लिए इंकार करते हैं तो ये यूपी के दो करोड़ क्षत्रियों के साथ बड़ा विश्वासघात होगा और क्षत्रिय समाज को यह मौका दोबारा नही मिलेगा।

Saturday, March 11, 2017

वर्ष 2017 में निर्वाचित उत्तराखण्ड और पंजाब के क्षत्रिय विधायकों की सूचि

उत्तराखण्ड के विजयी क्षत्रिय विधायकों की सूचि।

क्रमांक विधानसभा पार्टी विजयी प्रत्याशी
1 यमुनोत्री भाजपा श्री केदार सिंह रावत
2 गंगोत्री भाजपा श्री गोपाल सिंह रावत
3 कर्णप्रयाग भाजपा श्री सुरेन्द्र सिंह नेगी
4 केदारनाथ कांग्रेस श्री मनोज रावत
5 देवप्रयाग भाजपा श्री विनोद कण्डारी
6 प्रतापनगर भाजपा श्री विजय सिंह पंवार
7 टिहरी भाजपा श्री धन सिंह नेगी
8 धनौल्टी निर्दलीय श्री प्रीतम सिंह पंवार
9 चकराता कांग्रेस श्री प्रीतम सिंह
10 विकासनगर भाजपा श्री मुन्ना सिंह चौहान
11 सहसपुर भाजपा श्री सहदेव सिंह पुंडीर
12 डोईवाला भाजपा श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत
13 रानीपुर भाजपा श्री आदेश चौहान
14 श्रीनगर भाजपा डॉ धनसिंह रावत
15 चौब्बटाखाल भाजपा श्री सतपाल महाराज
16 लैंसडॉन भाजपा श्री दिलीप सिंह रावत
17  कोटद्वार भाजपा श्री हरक सिंह रावत
18 धारचूला कांग्रेस श्री हरीश सिंह
19डीडीहाट  भाजपा श्री बिशन सिंह
20 द्वाराहाट भाजपा श्री  महेश नेगी
21 अल्मोड़ा भाजपा श्री रघुनाथ सिंह चौहान
22 लोहाघाट से बीजेपी के पूरन सिंह फर्त्याल
23 भीमताल निर्दलीय श्री राम सिंह(?)
24 रामनगर भाजपा श्री दीवान सिंह बिष्ट
25 जसपुर कांग्रेस श्री आदेश सिंह चौहान
26 खटीमा से पुष्कर धामी।।
27अल्मोड़ा की सल्ट सीट से सुरेन्द्र सिंह जीना

पंजाब के क्षत्रिय विधायको की सूचि

1--पठानकोट की सुजानपुर से ठाकुर दिनेश सिंह बब्बू बीजेपी
2--आनन्दपुर साहिब से राणा केपी सिंह जी कांग्रेस (मंत्री बनेंगे)

संकलनकर्ता--रॉबिन पुण्डीर,डॉक्टर नितीश सिंह सूर्यवंशी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में निर्वाचित क्षत्रिय विधायकों की सूचि


उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय विधायकों की संख्या---

धीर सिंह पुण्डीर और पुष्पेन्द्र राणा द्वारा संकलित---

A---पश्चिमी उत्तर प्रदेश

सहारनपुर--
1--देवबन्द सीट से कुँवर बृजेश सिंह बीजेपी

शामली--
2--थानाभवन सीट से सुरेश राणा बीजेपी

मेरठ
3--सरधना सीट से संगीत सोम बीजेपी

गौतमबुद्धनगर
4--जेवर सीट से ठाकुर धीरेन्द्र सिंह बीजेपी
5--नॉएडा सीट से पंकज सिंह बीजेपी

बुलन्दशहर
6--सिकन्द्राबाद से विमला सोलंकी बीजेपी

अलीगढ़
7--बरौली से ठाकुर दलवीर सिंह बीजेपी
8--छर्रा सीट से रविंद्रपाल सिंह जादौन बीजेपी

मुजफ्फरनगर शून्य
बागपत शून्य

मथुरा--
9--गोवर्धन सीट से ठाकुर कारिंदा सिंह बीजेपी

आगरा--
10--बाह से रानी पक्षालिका सिंह बीजेपी
11--एत्मादपुर से रामप्रताप सिंह चौहान बीजेपी

हाथरस--
12--सिकन्दराराऊ सीट से वीरेंद्र सिंह राणा बीजेपी

इटावा---
13--इटावा सदर सीट से सरिता भदौरिया बीजेपी

एटा---
14--अलीगंज सीट से सत्यपाल सिंह राठौड़ बीजेपी

फर्रुखाबाद---
15--भोजपुर सीट से नागेंद्र सिंह राठौड़ बीजेपी

मैनपुरी शून्य
कासगंज शून्य

बिजनौर--
16--धामपुर सीट से अशोक राणा बीजेपी
17--नूरपुर सीट से लोकेन्द्र चौहान बीजेपी
18--बढ़ापुर सीट से सुशांत सिंह बीजेपी

अमरोहा--
19--नोगांवा सादात से चेतन चौहान

शाहजहाँपुर--
20--ददरौल से मानवेन्द्र सिंह बीजेपी
21--कटरा सीट से वीर विक्रम सिंह बीजेपी
21--जलालाबाद सीट से शरदवीर सिंह सपा

बदायूं--
22--दातागंज सीट से राजीव कुमार सिंह

मुरादाबाद शून्य
बरेली शून्य
कन्नौज शून्य
पीलीभीत शून्य
रामपुर शून्य
सम्भल शून्य

इस प्रकार पश्चिम उत्तर प्रदेश में कुल 23 क्षत्रिय राजपूत विधायक जीते, पिछली बार इस क्षेत्र से 15 राजपूत विधायक थे।

B--बुन्देलखण्ड क्षेत्र में---

हमीरपुर--
23--हमीरपुर से अशोक चन्देल बीजेपी

जालौन--
25--कालपी सीट से कुंवर नरेंद्रपाल सिंह जादौन बीजेपी

चित्रकूट शून्य
बांदा शून्य
ललितपुर शून्य
महोबा शून्य

बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 7 जिलो में मात्र 2 राजपूत विधायक जीत पाए, निराशाजनक रहा।।

C--अवध क्षेत्र में----

लखीमपुर खीरी---
26--लोकेन्द्र प्रताप सिंह बीजेपी

लखनऊ--
27--सरोजनीनगर सीट से स्वाति सिंह बीजेपी

उन्नाव--
28--बांगरमऊ सीट से कुलदीप सेंगर बीजेपी
28--पुरवा सीट से अनिल सिंह बसपा

गोंडा--
29--गोंडा सदर सीट से प्रतीक भूषण सिंह बीजेपी
30--करनैलगंज सीट से अजय प्रताप सिंह उर्फ़ लल्ला भैय्या बीजेपी
31--कटरा बाजार सीट से बावन सिंह बीजेपी

बलरामपुर--
32--गैसण्डी सीट से शैलेश कुमार सिंह बीजेपी

फतेहपुर---
33--फतेहपुर सदर सीट से विक्रम सिंह बीजेपी
34--हुसैनगंज सीट से रणवेंद्र प्रताप सिंह बीजेपी

कानपुर---
35--बिठूर सीट से अभिजीत सांगा बीजेपी

हरदोई---
36--सवायजपुर सीट से कुंवर मानवेन्द्र प्रताप सिंह बीजेपी

रायबरेली---
37--रायबरेली सदर सीट से अदिति सिंह कांग्रेस
38--हरचन्दपुर सीट से राकेश सिंह कांग्रेस
39--सरेनी सीट से धीरेन्द्र बहादुर सिंह बीजेपी

अमेठी---
40--अमेठी सदर सीट से रानी गरिमा सिंह बीजेपी
41--तिलोई सीट से कुंवर मयंकेश्वर शरण सिंह बीजेपी
42--गौरीगंज सीट से राकेश प्रताप सिंह सपा

फ़ैजाबाद---
43--बीकापुर सीट से शोभा चौहान बीजेपी

सुल्तानपुर---
44--सुल्तानपुर सदर सीट से सूर्यभान सिंह बीजेपी

प्रतापगढ़---
45--कुंडा सीट से रघुराज प्रताप सिंह "राजा भैया" निर्दलीय
46--पट्टी सीट से राजेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ मोती सिंह बीजेपी

बहराइच---
47--महसी सीट से सुरेश्वर सिंह बीजेपी

इस प्रकार अवध क्षेत्र में कुल 23 राजपूत विधायक जीते हैं, जो संतोषजनक है।

D---पूर्वांचल क्षेत्र से

गोरखपुर---
48--गोरखपुर ग्रामीण सीट से विपिन सिंह बीजेपी
49--कैम्पियरगंज सीट से फतेह बहादुर सिंह बीजेपी

डुमरियागंज---
50--बांसी से जयप्रताप सिंह बीजेपी
51--डुमरियागंज सीट से राघवेंद्र प्रताप सिंह बीजेपी

बस्ती--
52--हरैया सीट से अजयसिंह बीजेपी

महाराजगंज----
53--फरेन्दा सीट से बजरंग बहादुर सिंह बीजेपी

संतकबीरनगर----
54--मेहन्दावल सीट से राकेश सिंह बघेल बीजेपी

आजमगढ़---
55--सगड़ी सीट से वन्दना सिंह बसपा

जौनपुर---
56--जाफराबाद सीट से हरेन्द्र प्रताप सिंह बीजेपी

ग़ाज़ीपुर---
58--जमानिया सीट से सुनीता सिंह बीजेपी

चंदौली---
59--सैयदराजा सीट से सुशील सिंह बीजेपी
60--मुगलसराय सीट से साधना सिंह बीजेपी

बलिया---
61--रसड़ा सीट से उमाशंकर सिंह बसपा
62--बैरिया सीट से सुरेन्द्र सिंह बीजेपी

मिर्जापुर---शून्य
भदोई--शून्य
सोनभद्र---शून्य
मऊ---शून्य
वाराणसी--शून्य

इस प्रकार पूर्वांचल जहाँ क्षत्रियो की भारी संख्या है वहां मात्र 14 राजपूत विधायक जीत पाए जबकि यहाँ से 30 विधायक आराम से जीत सकते थे,
यही नही आजमगढ़ जिले में बीजेपी ने बड़ा खराब प्रदर्शन किया।

इस प्रकार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में कुल 403 विधानसभा सीटों में 62 राजपूत विधायक चुने गए,  जो बहुत अधिक नही हैं ,
यूपी में 1980 में 108 राजपूत विधायक चुने गए थे और 2007 से पहले भी 75-80 तक राजपूत विधायक चुने जाते रहे हैं।।।

2007 में मात्र 43 और 2012 में 48 राजपूत विधायक चुने गए थे।

इस बार चुने गए 62 राजपूत विधायको में 02 कांग्रेस, 03 बसपा, 02 सपा, 01 निर्दलीय और 54 राजपूत बीजेपी से जीतकर आए हैं।

इस प्रकार उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संख्या में राजपूत विधायक जीत कर आए हैं, और बीजेपी में भी सबसे ज्यादा संख्या राजपूत समाज के विधायको की है।
दूसरे स्थान पर ब्राह्मण समाज के विधायक होंगे।क्षत्रियों ने एकजुट होकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को जमकर समर्थन किया और ब्राह्मणों वैश्य अतिपिछड़ों को भी बीजेपी के समर्थन के लिए प्रेरित किया।

बहरहाल राष्ट्रवाद की विजय हुई, सर्वसमाज ने एकजुट होकर राष्ट्रवाद के नाम पर वोट दिया। अब मोदी जी मुख्यमंत्री पद पर किसे चुनेंगे इसपर नजर है।

सर्वश्रेष्ठ प्रशासक चुने तो राजनाथ सिंह जी का कोई मुकाबला नही

सबसे लोकप्रिय हिंदुत्ववादी नेता चुने तो योगी आदित्यनाथ जी सबसे आगे

दिनेश शर्मा जी की छवि भी अच्छी है और केशव प्रसाद ने भी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अच्छा काम किया है।

पर जनभावनाएं को पढ़ा जाए तो योगी जी मुख्यमंत्री पद के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होंगे।

लेखक और संकलनकर्ता--धीर सिंह पुण्डीर और पुष्पेन्द्र राणा 

Wednesday, March 8, 2017

यूपी में बीजेपी को बहुमत मिलेगा, विजय का महानायक कौन???

बीजेपी को बहुमत मिलेगा, विजय नायक कौन??---

यूपी विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही भृष्ट मीडिया द्वारा अखिलेश सरकार की वापसी का माहौल बनाया गया, ऐसा लगा मानो बीजेपी का वनवास और लम्बा होगा तथा लगातार दूसरा चुनाव जीतकर अखिलेश राष्ट्रीय नेता बन जाएगे,किन्तु जनता के मन में कुछ और ही चल रहा था,

यूपी में पहले चरण में बीजेपी हार के कगार पर थी----
तीन सबसे बड़े सामाजिक वर्ग मुस्लिम दलित और जाट यहाँ बीजेपी को हराने को कटिबद्ध थे,
अमित शाह की सभी सभाएं विफल हो रही थी और जाटों को बीजेपी के पक्ष में लाने के उनके सभी प्रयास व्यर्थ हो गए थे।।

ऐसे में बीजेपी ने मजबूर होकर योगी आदित्यनाथ को आगे किया जिन्होंने बिना संकोच के आक्रामक शैली में प्रचार किया जिसकी बदौलत गैर जाट/जाटव हिन्दू मत (कुल मतों का 48%) बीजेपी के पक्ष में एकजुट हो गए, राजनाथ सिंह की सभाओं ने भी दर्जनों सीटों पर बीजेपी को संजीवनी दी।

योगी जी और राजनाथ सिंह ही बीजेपी की ओर से प्रथम चरण के सबसे मुश्किल क्षेत्र में स्टार प्रचारक रहे और बीजेपी इस कठिन क्षेत्र से न सिर्फ सुरक्षित निकल गयी बल्कि सबसे आगे रही।

योगी आदित्यनाथ द्वारा बनाई गयी हिन्दू लहर द्वितीय चरण में रुहेलखण्ड के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में और जोर से चली, मुस्लिम वोट सपा बसपा में बंट गया और हिन्दू मतदाता बीजेपी के पक्ष में प्रथम चरण से भी अधिक एकजुट रहे, जिससे दूसरे चरण में बीजेपी बहुत आगे निकल गयी ।

प्रथम दोनों चरण में बीजेपी की बढ़त के समाचार जैसे ही फैलने लगे, बीजेपी का आत्मविश्वास बढ़ता चला गया।

अब तृतीय चरण में इटावा मैनपुरी के अहीर बाहुल्य क्षेत्र और अवध के इलाके में मतदान हुआ, यहाँ अहीरों द्वारा गत पांच वर्षो में जो एकाधिकार और वर्चस्व जमाया हुआ था उसके विरुद्ध गैर अहीर हिन्दू मतदाताओं का बीजेपी के पक्ष में जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ और बीजेपी लगातार तीसरे चरण में सबसे आगे रही।

अब बीजेपी को सत्ता पास दिखाई देने लगी, मोदी जी भी रंग में आ गए,और सपा सुप्रीमो अखिलेश को भी हार के संकेत साफ़ दिखाई देने लगे,झुंझलाहट उनके भाषणों में साफ़ दिखाई देने लगी।पहले तीन चरण में पर्याप्त संख्या में मुस्लिमो को टिकट देने के बावजूद मुस्लिम का रुझाम सपा की ओर रहने से बसपा की हालत एकदम खराब हो गयी।

चौथे चरण में बुन्देलखण्ड और इलाहाबाद के आसपास के जनपदों में मतदान हुआ, यहाँ मुस्लिम वोट कम थे
बुन्देलखण्ड में गैर अहीर ओबीसी और स्वर्ण बीजेपी के पक्ष में एकजुट हुए जिससे बुन्देलखण्ड में बीजेपी का पलड़ा भारी रहा और बाकि जगह सपा कांग्रेस गठबंधन का बीजेपी से मुकाबला रहा।

चोथे चरण के मतदान के बाद बीजेपी की स्पष्ट बढ़त साफ़ दिखाई देने लगी, और यहाँ से सपा ने रणनीति बदली, स्वर्णो में पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता का लाभ उठाने के लिए योगी और राजनाथ सिंह के नाम से ब्राह्मणों को भड़काया जाने लगा, इस रणनीति का कुछ लाभ पांचवे चरण में अवध क्षेत्र में विपक्ष को मिला और पहले चार चरण से सरपट भाग रही बीजेपी की बढ़त को थोडा ब्रेक मिला,
स्वर्णो की आपसी फुट से पांचवे चरण में सपा गठबंधन और बीजेपी में लगभग बराबरी का मुकाबला हुआ।

यहाँ से बीजेपी और संघ के एक वर्ग ने बीजेपी को बहुमत से पहले ही 150 सीट तक रोकने की रणनीति अपनाई और सपा बसपा के साथ मिलकर जातिवाद का जहर फैलाने का प्रयास हुआ,
इनकी रणनीति थी कि छठे चरण में योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले इलाके में बीजेपी खराब प्रदर्शन करेगी तो योगी की सीएम दावेदारी खत्म हो जाएगी और बहुमत न मिलने की स्थिति में मायावती को बीजेपी का समर्थन दिलवाकर मुख्यमंत्री बनवा दिया जाए,

किन्तु अब मोदी जी ने मोर्चा सम्भाला ,मोदी और योगी के आक्रामक प्रचार से विपक्ष धराशायी हो गया,
मुस्लिम मत इस चरण में बसपा की ओर शिफ्ट हो गया जिससे आजमगढ़ बलिया में बीजेपी का मुकाबला बसपा से हुआ,
सपा इस चरण में लगभग सफा हो गयी।

सातवे चरण से पहले ही बीजेपी बहुमत के नजदीक पहुंच चुकी थी, अब मोदी जी ने लगातार 3 दिन बनारस में प्रचार करके अंतिम चरण में बीजेपी की लहर को सुनामी में बदल दिया,

विपक्ष ने अंतिम दो चरण में ब्राह्मणों को योगी और राजनाथ के नाम से बहकाकर स्वर्णो में फूट डालने का प्रयास किया किन्तु सफल नही हुए,
अंतिम दो चरण में बीजेपी ने पूर्वांचल में विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया।।

कुल मिलाकर बीजेपी यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।

बीजेपी की शानदार विजय के महानायक ये रहे---

1--प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी (जिनका जलवा कायम है)
2--योगी आदित्यनाथ (आक्रामक हिंदुत्ववादी प्रचार)
3--राजनाथ सिंह (सर्वश्रेष्ठ वक्ता)
4--अमित शाह (शानदार रणनीति)
5--ओम माथुर (अमित शाह के सहायक)
6--केशव प्रसाद मौर्य(अतिपिछड़ों में इनके कारण प्रदेशव्यापी सन्देश)

क्षेत्रीय स्तर पर संगीत सोम, सुरेश राणा, ओमप्रकाश राजभर, मनोज तिवारी, मनोज सिन्हा,अनुप्रिया पटेल,उमा भारती सुनील बंसल आदि भी उपयोगी सिद्ध हुए।

अब देखना ये है कि यूपी में बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री किसे बनाया जाता है।।

सर्वश्रेष्ठ प्रशासक के रूप में राजनाथ सिंह सबसे आगे हैं वहीँ लोकप्रियता की कसौटी पर योगी आदित्यनाथ सबसे आगे हैं

अतिपिछड़ों में केशव मौर्य का दावा मजबूत है ब्राह्मणों में दिनेश शर्मा और महेन्द्रनाथ पाण्डेय की छवि सबसे बेहतर है

जनभावनाओं का सम्मान मोदी जी करना चाहें तो योगी जी सीएम पद हेतु सर्वश्रेष्ठ नेता हैं अगर हरियाणा की तरह ही मोदी जी किसी रबर स्टाम्प मुख्यमंत्री को चाहते हों तो दर्जनों छुटभैये नेता इस पद की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं जिनका प्रचार में कोई योगदान नही है ।।

जनभावनाओं का अपमान किया गया तो 2019 अधिक दूर नही है।

Monday, March 6, 2017

शीर्ष सत्ता (मुख्यमंत्री पद) के अभाव में बिहार में उपेक्षित ही रहा राजपूत समाज

बिहार में 7% जनसंख्या वाला राजपूत समाज स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शीर्ष सत्ता से सैदेव वंचित रहा----

दीपनारायण सिंह --17 दिन
हरिहर सिंह--4 महीना
चन्द्रशेखर सिंह --7 महीना
सत्येंद्र नारायण सिंह--9 महीना

कुल 04 राजपूत मुख्यमंत्री टुकड़ों में महज 20 महीना राज कर पाए ,
70 वर्षों में कुल 2 वर्ष से भी कम राजपूत सीएम रहे,
शीर्ष सत्ता के आभाव में राजपूत समाज निरन्तर पिछड़ता चला गया और राजपूतों से द्वेषभाव रखने वाले अहीर, भूमिहार,कुर्मी आदि वर्गों के सत्ताधारियों ने भी राजपूत समाज को हर स्तर पर सताने में कोई कसर नही छोड़ी।

बिहार में कुल 3% जनसंख्या वाले भूमिहार समाज ने प्रारम्भ में ही लगातार 17 वर्ष बिहार पर राज किया,
बिहार में कांग्रेस द्वारा प्रथम मुख्यमंत्री पद के लिए बाबू अनुग्रह नारायण सिंह (राजपूत) की बजाय भूमिहार श्रीकृष्ण सिंह का चयन किया और श्रीकृष्ण सिंह लगातार 16 वर्ष बिहार के सीएम रहे, इन 16 वर्षों में भी सरकारी सहयोग से भूमिहार समाज ने निर्णायक बढ़त ली और अधिकांश सरकारी पदों पर कब्जा जमा लिया।।

बिहार में मात्र 3% जनसंख्या वाले कुर्मी समाज से नितीश कुमार पिछले 12 वर्षों से लगातार बिहार पर राज कर रहे हैं, इन्होंने इस कार्यकाल में अपने समाज को जमकर लाभ पहुंचाया और इनके कार्यकाल में राजपूतों को जमकर उपेक्षित किया गया, इन्होंने भूमिहारो को साथ रखकर राजपूतों को दरकिनार करने का पूरा प्रयास किया।

बिहार में 7% जनसंख्या वाले ब्राह्मण समाज ने भूमिहारो के साथ क्षत्रिय विरोधी गठबंधन बनाकर बिहार में 13 वर्ष तक शासन किया,

बिहार में 13% जनसंख्या वाले अहीर/ग्वाला समाज ने लालू प्रसाद के नेतृत्व में बिहार में लगातार 16 वर्ष राज किया और जमकर अपने समाज का भला किया, इनके राज में बिहार में सब जगह अहीरों का बोलबाला रहा,
कुछ राजपूतो को इन्होंने अपने साथ जोड़ा पर लालू प्रसाद स्वाभाविक रूप से राजपूतो के घोर शत्रु थे,इनका कार्यकाल राजपूतों और भूमिहारो का पतनकाल रहा।

इस प्रकार बिहार में अहीर और भूमिहार लम्बे समय तक सत्ताधारी रहे जिससे इनका वर्चस्व बढ़ा और इनका आर्थिक विकास बढ़ा,वहीँ पर्याप्त जनसंख्या होते हुए भी राजपूत सदैव उपेक्षित रहे।

कभी भूमिहार-ब्राह्मण तो कभी अहीर-कुर्मियों के शासन में राजपूत समाज को उभरने का मौका ही नही मिला।

गत बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से संकेत दिया गया कि इस बार राजेन्द्र सिंह को बीजेपी की ओर से सीएम उम्मीदवार बनाया जाएगा जिससे लगा कि बिहार में फिर से स्वर्णो के दिन बहुरेंगे, और लम्बे समय से उपेक्षित राजपूत समाज को मौका मिलेगा,
मगर तभी भूमिहार नेता गिरिराज सिंह ने द्वेषवश बयान दिया कि बीजेपी का मुख्यमंत्री पिछड़े समाज से होगा,
मोदी जी भी आरक्षण व्यवस्था बचाने के लिए जान की बाजी लगा दूंगा जैसा घटिया बयान दे बैठे,
बेचारे राजेन्द्र सिंह मुख्यमंत्री तो क्या बनते विधानसभा चुनाव ही हार बैठे।

स्वर्णो की फुट से बीजेपी हार गयी ,राजपूतों को नीचा दिखाने के चक्कर में स्वर्णो ने अपना ही विनाश कर लिया।।

Saturday, February 11, 2017

भरसक प्रयासों के बावजूद अखिलेश यादव हिन्दू शेर ठा0 संगीत सोम को जीतने से रोक पाए ?


सरधना सीट पर संगीत सोम को हराने को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था और इस काम के लिए वो पिछले 5 साल से अपने सिपहसालार अतुल प्रधान को तैयार कर रहे थे,
क्या सफल हुए अखिलेश अपनी योजना में या हिन्दू शेर ने उन्हें चित कर दिया????

सरधना सीट का रुझान----
सरधना सीट पर संगीत सोम को हराने को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था और इस काम के लिए वो पिछले 5 साल से अपने सिपहसालार अतुल प्रधान को तैयार कर रहे थे,
क्या सफल हुए अखिलेश अपनी योजना में या हिन्दू शेर ने उन्हें चित कर दिया????

पेश है सरधना का आज के मतदान का रुझान---

सरधना में आज मुस्लिम मतदाता भर्मित नजर आया,कहीं बसपा के इमरान कुरैशी का जोर रहा तो कहीं अतुल प्रधान का जोर रहा।
मुस्लिम वोट लगभग बराबर दो जगह बंट गया,

मुस्लिम वोट सपा को जाता देखकर न्यूनतम 25% दलित बीजेपी के पाले में जुड़ गया जिससे संगीत सोम को दलितों के 10 हजार वोट मिल गए,

राजपूत बाहुल्य गाँवो खेड़ा, रार्धना, सलावा आदि जगह राजपूतो ने समझा बुझाकर येन केन प्रकारेण कुछ मुस्लिम वोट भी सोम के पक्ष में डलवा लिए, वहीँ कुछ मुस्लिम राजपूतो ने भी संगीत सोम को वोट दिया।

सैनी मतदाता जबरदस्त ढंग से संगीत सोम के पक्ष में एकजुट रहे।

जाट मतदाता उम्मीद के मुताबिक संगीत सोम को नही मिले, पर अतुल प्रधान को और इमरान कुरैशी को भी नही मिले,

गुज्जर वोट 90% अतुल प्रधान पर और 10% संगीत सोम को मिला,

राजपूत बाहुल्य गाँवो में जबरदस्त मतदान हुआ, कई गांव में 90% तक पोल हो गया,
राजपूतो के गाँवो से ही सोम को 60 हजार से ज्यादा वोट सर्वसमाज की मिल जाएंगी।
राजपूत वोटों में अतुल प्रधान ने लगभग 4000 वोट की सेंधमारी जरूर की।

त्यागी, वैश्य, ब्राह्मण अतिपिछड़ा आदि शेष हिन्दू समाज में संगीत सोम को 80% तथा सपा के अतुल प्रधान को 20% वोट मिला।

इस प्रकार---
संगीत सोम की सरधना में लगभग 1 लाख 40 हजार न्यूनतम वोट है।
इनमे से 45 हजार ठाकुर हैं जिनमे 90% तक मतदान का लक्ष्य रखा गया था।संगीत की वोटो की पोलिंग अगर 80% तक भी होती है तो 1.20 लाख वोट होते हैं।

विरोधी वोट लगभग 2 लाख जिनमे 1 लाख से ऊपर मुस्लिम, लगभग 60 हजार दलित और 33 हजार गूजर हैं। इनमे 10 हजार दलित और 3 हजार गूजर भी संगीत की वोट हैं।

बाकी वोट इमरान और अतुल में बंटा है।
बहुसंख्यक दलित इमरान और बहुसंख्यक गूजर अतुल को। मुसलमान वोट दोनों में बंटा है।

अगर इमरान को बहुसंख्यक दलित के साथ 80% भी मुसलमान भी मिले है तो भी 75% वोटिंग के अनुसार 90 हजार के आसपास ही पहुँचते हैं। हालांकि इतनी मुसलिम वोट नही मिली उसे।

और कोई समीकरण भी नही जिससे संगीत हार सकता है। संगीत सोम के वोट में थोड़ी बहुत सेंध भी लगती है तो भी न्यूनतम 20 हजार वोट से जीत होगी,

वैसे संगीत सोम की जीत कम से कम 30 हजार वोट से होगी, अतुल प्रधान अखिलेश यादव द्वारा पूरा जोर लगाए जाने के बाद भी लगातार दूसरी बार हारेगा।
यह हार मुख्यमंत्री अखिलेश की व्यक्तिगत हार होगी।

Thursday, February 2, 2017

अविस्मरणीय राजपूत नेता स्वर्गीय ठाकुर महावीर सिंह राणा जी

अविस्मरणीय स्वर्गीय ठाकुर महावीर सिंह राणा जी की 23 वी पुण्यतिथि पर उनको शत शत नमन------

सहारनपुर के अब तक के सबसे लोकप्रिय और दबंग राजपूत नेता स्वर्गीय ठाकुर महावीर सिंह राणा जी की आज 23 वी पुण्यतिथि है,
स्वर्गीय राणा जी को शत शत नमन।।

सहारनपुर ,हरिद्वार और पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज तक स्वर्गीय महावीर राणा जी को याद किया जाता है,वो जिस दबंगई से अपने सर्वसमाज के समर्थकों और राजपूत समाज की लड़ाई लड़ते थे,उनके बाद यहाँ कोई राजपूत नेता ऐसा नही कर पाया,

उनसे राजनीति के गुर सीखने वाले उनके कई शागिर्द बाद में सांसद, विधायक और मंत्री तक बने,पर दबंगई से राजपूत समाज की जितनी जोरदार पैरवी स्वर्गीय राणा जी करते थे उनका कोई शागिर्द कभी इतना खुलकर राजपूत समाज के काम नही आया।

दिनांक 10 जुलाई सन् 1940 को सहारनपुर में राजपूतों के प्रसिद्ध बेहड़ा संदलसिंह गांव में पिता श्री आशा सिंह राणा जी और माता कलावती के घर जन्मे स्वर्गीय महावीर सिंह राणा जी का नाम पहले छात्र राजनीति में चमका और वो 1968 ईस्वी में यहाँ के सबसे बड़े जे0 वी0 जैन डिग्री कॉलेज में छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गए।।

आप 1971 में एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष चुने गए और 1976 तक इस पद पर बने रहे, कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई की सहारनपुर में स्थापना का श्रेय इन्हें ही जाता है।

वो समय सहारनपुर में गुर्जर/राजपूतों के बीच वर्चस्व की जंग का था, जब स्वर्गीय महावीर सिंह छात्र राजनीति में आए उस समय जिले के दिग्गज गुर्जर नेता पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद चौधरी यशपाल सिंह की तूती बोलती थी, उस समय वो घोर राजपूत विरोधी थे, और कांग्रेस पार्टी में राजपूतो को दरकिनार करने की राजनीती करते थे,
उन्होंने सहारनपुर में छात्र संघ चुनाव में भी गुर्जरो को आगे बढ़ाया, पर उनका सफलतापूर्वक मुकाबला राणा जी ने किया और कई बार उन्होंने चौधरी यशपाल सिंह समर्थको को धूल चटाई।

उस समय सहारनपुर जिले में मंत्री चौधरी यशपाल सिंह के समर्थन से गुर्जरो की दबंगई चलती थी, जिसे तेजी से उभर रहे छात्र नेता महावीर सिंह राणा ने चुनौती दी और जल्द ही उनका गुट गुर्जरो पर भारी पड़ गया, उनके आशीर्वाद से लंबे समय तक सहारनपुर के छात्र संघो में राजपूतो का डंका बज गया और गुर्जरो की दबंगई ध्वस्त हो गयी।

छात्र संघ से चर्चा में आए महावीर सिंह भी कांग्रेस में शामिल हो गए और उन्होंने चौधरी यशपाल सिंह के विरुद्ध अपना प्रबल गुट बना लिया, उन्हें यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह, वीर बहादुर सिंह और बाद में एनडी तिवारी का भरपूर आशीर्वाद मिला,
शीघ्र ही संजय गांधी की उन पर नजर पड़ी और उन्होंने युवा महावीर राणा का नाम एमएलसी के लिए प्रस्तावित किया और युवावस्था में ही वो उत्तर प्रदेश विधानपरिषद में एमएलसी निर्वाचित हुए, इस पद पर वो 1980 से 1985 तक बने रहे।

एमएलसी निर्वाचित होने पर उन्होंने प्रदेश स्तर पर कांग्रेस पार्टी में पकड़ बनाई और जल्द ही राणा जी के प्रयासों से सीएम वीपी सिंह के द्वारा चौधरी यशपाल सिंह की यूपी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गयी।
इसी बीच सन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी और इंदिरा लहर पर सवार होकर चौधरी यशपाल सिंह सहारनपुर से सांसद चुने गए,

अब 1985 विधानसभा चुनाव आए और वीपी सिंह सीएम पद से हटकर केंद्र में चले गए, यूपी में नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस की ओर से सीएम उम्मीदवार थे, स्वर्गीय महावीर सिंह राणा जी देवबन्द या बेहट सीट से कांग्रेस टिकट चाहते थे, पर चौधरी यशपाल सिंह ने तिवारी से कहकर सबक सिखाने के लिए उनका टिकट हरिद्वार शहर विधानसभा सीट से करवा दिया जहाँ राजपूत वोट नगण्य थे।।

मुश्किल सीट से टिकट मिलने पर भी महावीर राणा जी ने हार नही मानी और चुनौती को स्वीकार किया, सहारनपुर के सैंकड़ो छात्रों की टीम हरिद्वार शहर विधानसभा में जुट गई, वहां उनका मुकाबला दिग्गज स्थानीय व्यापारी नेता अम्बरीष कुमार से था, जो अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चल रहे थे,
किन्तु जब मतगणना का परिणाम आया तो सभी भौचक्के रह गए, महावीर सिंह राणा ने कड़े मुकाबले में मात्र 71 वोट से अम्बरीष कुमार को हरा दिया,
हालाँकि अम्बरीष कुमार ने राणा समर्थको पर जमकर बूथ कैप्चरिंग का आरोप लगाया और मतगणना में भी भारी धांधली के आरोप लगे,

अम्बरीष कुमार समर्थक आज भी कहते है कि मतगणना में अम्बरीष कुमार आगे चल रहे थे, तभी लाइट चली गयी और थोड़ी देर में जब लाइट वापस आई तो महावीर राणा जी 71 मतों से जीत चुके थे।।
खैर सच जो भी हो एक अपरिचित क्षेत्र में भी 1 महीना पहले जाकर जीत के झंडे गाड़ देने से स्वर्गीय महावीर राणा जी का डंका बज गया।।

सहारनपुर जनपद से हरिद्वार को काटकर अलग जिला बनवाए जाने का श्रेय इन्हें ही जाता है।

बाद में मुख्यमंत्री एनडी तिवारी भी इनकी प्रतिभा के कायल हो गए, मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी प्यार से उन्हें संकट मोचक बजरंगी के नाम से बुलाते थे ,
जब भी पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसी भी संकट का निवारण कोई नहीं कर पता था तो बजरंगी सदैव संकट से उभारते थे ।। बहुत से ऐसे यादगार किस्से जुड़े हैं उस तेजस्वी व्यक्तित्व के साथ ।।

वर्ष 1989 में जनता दल की लहर के बावजूद महावीर राणा जी कांग्रेस टिकट पर देवबन्द सीट से जीतकर पुनः विधानसभा पहुंचे।
किन्तु उसके बाद कांग्रेस का सितारा यूपी में डूबने लगा,वर्ष 1991 में राणा जी अपने ही शागिर्द जनता दल के ठाकुर वीरेंद्र सिंह से पराजित हुए,इसी वर्ष महावीर राणा जी के एक और शिष्य जगदीश सिंह राणा जी मुजफ्फराबाद सीट से जीतकर विधायक बने जो बाद में सांसद और मंत्री भी बने।

कांग्रेस के पराभव के बावजूद महावीर राणा जी ने पार्टी नही छोड़ी।।
सन 1994 को अपनी कर्मस्थली हरिद्वार में कम आयु में ही आपका हृदयघात से देहांत हो गया, जो सहारनपुर और पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजपूतों के लिए बड़ा झटका था, उन्होंने सफलतापूर्वक अपने समय के दिग्गज गुर्जर नेता स्वर्गीय चौधरी यशपाल सिंह की राजपूत विरोधी नीतियों का मुकाबला किया और राजपूतो की धाक सहारनपुर जिले में बनाई।।
इनके कई शिष्य बाद में सांसद विधायक और मंत्री भी बने, पर जो धाक स्वर्गीय महावीर सिंह राणा की थी वो उनके बाद किसी और की नही हुई।

इनकी मृत्यु के कुछ समय बाद ही इनके परिवार पर एक और वज्राघात हुआ जब इनके एकमात्र युवा पुत्र विवाह के कुछ समय बाद ही सड़क दुर्घटना में चल बसे, इतने दिग्गज नेता का अब कोई वारिस नही बचा है ।।।
उनकी मृत्यु के 23 वर्ष बाद भी कोई उन्हें भुला नही पाया है और राजपूत ही नही सर्वसमाज में उनको श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है, उनके धुर विरोधी गुर्जर नेता चौधरी यशपाल सिंह भी उनकी प्रतिभा के कायल थे और जीवन के अंतिम दशक में उन्होंने सहारनपुर में गुर्जर राजपूत समाज में एकता लाने के प्रयास किये।

स्वर्गीय महावीर सिंह राणा जी की पुण्यतिथि पर उनको कोटि कोटि नमन 💐💐💐💐

Wednesday, February 1, 2017

बेहट सीट पर विकास के दम पर सामाजिक समीकरणों को ध्वस्त कर पाएंगे महावीर सिंह राणा?

उत्तर प्रदेश की सीट संख्या 01----

सहारनपुर की बेहट सीट,
भौगौलिक रूप से इसकी सीमाएं उत्तराखण्ड,हरियाणा से मिलती है और हिमाचल प्रदेश की सीमा भी यहाँ से बहुत नजदीक है।।

यहाँ के आंकड़ो पर विशेष ध्यान दीजिये...

इस विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोट 52% है, दलित वोट 18% है, सैनी वोट 8% है
और बचे हुए 22% हिंदुओं में राजपूत समेत 36 जातियां हैं!!!

बसपा ने इस सीट पर उत्तर प्रदेश के सबसे धनवान मुस्लिम प्रत्याशी हाजी इक़बाल को टिकट दिया है, जो दलित+मुस्लिम मतों [18+52=70%] के सहारे अपनी जीत के प्रति आश्वस्त है!!!

सपा कांग्रेस गठबंधन ने इस सीट पर नरेश सैनी को टिकट दिया है जो पिछली बार मात्र 500 वोट से हार गए थे, ये भी सैनी+मुस्लिम मतो [10+52÷2=36%] के सहारे इस बार जीत के ख्वाब देख रहे हैं।।।पर इन्हें इस बार मुस्लिम मत मिलते दिखाई नही दे रहे हैं, जिससे सैनी मतदाता भी आशंकित हैं कि कहीं बसपा के हाजी इक़बाल न जीत जाएं इसलिए अंतिम समय में राष्ट्रवादी  सैनी वोट बीजेपी के पाले में जा सकते हैं।

बीजेपी ने इस सीट पर वर्तमान विधायक महावीर सिंह राणा को टिकट दिया है, जिनके भाई श्री जगदीश सिंह राणा इस क्षेत्र से 3 बार विधायक और यूपी में कैबिनेट मंत्री रहे हैं और वर्ष 2009-2014 के बीच सहारनपुर लोकसभा सीट से सांसद भी रहे हैं।
इन्हें हरवाने के लिए जसमोर स्टेट के कुंवर आदित्य प्रताप राणा भी वोटकटवा के रूप में निर्दलीय खड़े हो गए हैं!!!
हिन्दुओ में 10 हजार वोट वाली काम्बोज बिरादरी के उम्मीदवार को रालोद से टिकट दिलवाकर भी बीजेपी उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाया गया है!!!!

अब बताइये क्या उपरोक्त सामाजिक समीकरणों के हिसाब से यहाँ बीजेपी उम्मीदवार की जीत के कोई चांस हैं ?????????

प्रथम दृष्टया देखने पर यह असम्भव लगता है पर पहले भी राणा परिवार अपनी लोकप्रियता और विकासवादी नीतियों के दम पर सामाजिक समीकरणों को ध्वस्त करके इस सीट पर 5 बार सफलता के झंडे गाड़ चुका है...

मात्र 22% अन्य हिन्दू वोट के सहारे जीत सम्भव नही जब तक मुस्लिम,दलित और सैनी वोट में सेंध न लगाई जाए और भले ही महावीर राणा बीजेपी के टिकट पर खड़े हों फिर भी वो अपने परम्परागत मुस्लिम मतो को अपने पाले में खींचने में कामयाब हो रहे हैं...

वेस्ट यूपी में महावीर सिंह राणा और जेवर सीट से ठाकुर धीरेन्द्र सिंह ही ऐसे उम्मीदवार होंगे जो बीजेपी के टिकट पर भी मुस्लिम मतो को अपनी ओर खींच पाने में सक्षम होंगे,

अगर महावीर राणा 10 हजार मुस्लिम, 10 हजार दलित और इतने ही सैनी मतो को अपनी ओर खींच पाए तो इस मुस्लिम बाहुल्य सीट पर एक बार फिर से चमत्कार सम्भव है।
और अभी तक महावीर सिंह राणा अपनी कोशिस में सफल दिखाई दे रहे हैं

Thursday, January 26, 2017

सर्वसमाज के समर्थन से थानाभवन सीट से सुरेश राणा की जीत पक्की,बनेंगे कैबिनेट मंत्री

वेस्ट यूपी में शामली जिले की थानाभवन सीट------

कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे होते हैं जहाँ किसी व्यक्तित्व के प्रभाव से जातिगत समीकरण धरे के धरे रह जाते हैं, ऐसी ही एक सीट है शामली की थानाभवन सीट जहाँ अपनी लोकप्रियता के दम पर वर्तमान विधायक सुरेश राणा सामाजिक समीकरणों को धता बताकर पुन: जीतने जा रहे हैं और यूपी में बीजेपी सरकार बनी तो कैबिनेट मंत्री भी अवश्य बनेंगे।

पिछली बार सुरेश राणा नए थे और मुस्लिम मतों में बंटवारे की वजह से मामूली अंतर से जीत पाए थे, इस बार मुजफ्फरनगर शामली इलाके में हुए साम्प्रदायिक तनाव से उनकी और संगीत सोम की छवि हिन्दू हृदय सम्राट की बन चुकी है। अब उनकी लोकप्रियता और पहचान राष्ट्रव्यापी हो चुकी है, इस बार इन्हें उन वर्गों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है जो गत चुनाव में नही मिल पाया था,

बसपा ने इस सीट से पूर्व विधायक राव अब्दुल वारिस खान (मुस्लिम राजपूत) को, सपा ने डॉक्टर सुधीर पवार (जाट समाज से) को, और रालोद ने राव जावेद खान (मुस्लिम राजपूत) को टिकट दिया है, इस बार मुस्लिम मतों में बिखराव पहले की अपेक्षा कम है,
सपा उम्मीदवार को जाट मतदाताओं का समर्थन मुजफ्फरनगर दंगो में सपा सरकार की भूमिका के कारण नही मिल पा रहा है,
जाट वोट का बहुमत भी सुरेश राणा को मिल रहा है।

थानाभवन सीट का सामाजिक समीकरण और रुझान निम्नवत दिखाई दे रहा है-----

95,000 मुस्लिम
45,000 जाट
45,000 दलित
24,000 राजपूत
35,000 कश्यप
30,000 सैनी
10000 ब्राह्मण
10000 वैश्य व्यापारी
4000   रोड
30000 अतिपिछड़ा ,वाल्मीकि आदि

बसपा उम्मीदवार राव अब्दुल वारिस का समीकरण---

मुस्लिम---65000
दलित ---35000
अन्य---5000
कुल--105000 इनका वोट प्रतिशत होगा 70%==71000

बसपा उम्मीदवार को कुल 70000--75000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं।

सपा उम्मीदवार--डॉक्टर सुधीर पवार का समीकरण

मुस्लिम--10000
जाट--10000
अन्य---5000
टोटल 25000 इनका वोट प्रतिशत होगा 55%=14000

सपा उम्मीदवार को 13000--15000 वोट मिलता दिखाई दे रहा है, इनकी जमानत बचना भी मुश्किल है।

रालोद उम्मीदवार राव जावेद का समीकरण---

मुस्लिम --15000
जाट--15000
अन्य--5000

कुल 35000, इनका वोट प्रतिशत होगा 62%=23000

रालोद उम्मीदवार को 20000--25000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं।

बीजेपी उम्मीदवार सुरेश राणा का समीकरण---

मुस्लिम--1000
दलित--9000
जाट--24000
सैनी--25000
कश्यप--29000
ठाकुर--22000
अन्य हिन्दू--45000

कुल--155000 ,इनका वोट प्रतिशत होगा 58%=90000

बीजेपी उम्मीदवार को 87000--90000 वोट मिलते दिखाई दे रहे हैं,

इस प्रकार कम से कम 15 हजार वोट से सुरेश राणा की विजय होगी,
किन्तु मुस्लिम वोट पूरी तरह एकजुट होकर बसपा प्रत्याशी पर पड गया या जाट/दलित मतदाताओ में बीजेपी को अधिक समर्थन न मिल पाया तो कांटे का चुनाव भी हो सकता है।
ऐसे में सुरेश राणा की राष्ट्रव्यापी छवि और उनके भावी कैबिनेट मंत्री होने की आशा उनके लिए संजीवनी का कार्य करेगी।।

अगर बीजेपी समर्थक वोटरो का मतदान प्रतिशत बढ़ा लिया जाए तो जीत का अंतर 30000 तक होगा भले ही 70% मुस्लिम बसपा को मिल जाए।।
मुस्लिम 90% एकतरफा गए तब भी बीजेपी जीत सकती है पर हिन्दू समाज में पोलिंग 70% से ऊपर करवाना होगा अन्यथा समस्या हो सकती है।

अभी तक के रुझान से सुरेश राणा थानाभवन सीट से लगातार दूसरी बार बाजी मारते दिखाई दे रहे हैं और यह जीत उनके राजनैतिक कैरियर में मील का पत्थर सिद्ध होगी।

Monday, January 23, 2017

सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद बीजेपी बढ़त पर, पर बहुमत से दूर

सपा कांग्रेस गठबंधन के बावजूद बीजेपी बढ़त पर---

यूपी में स्वर्ण हिन्दू वोट तकरीबन 25% है

यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में समाजवादी पार्टी को राजपूत ब्राह्मणों और अन्य स्वर्णो का 35% वोट मिला था, कांग्रेस को 10% स्वर्णो का वोट मिला था,
यानि 45% स्वर्णो का समर्थन इन दोनों को मिला था

इस बार सपा कांग्रेस ठगबंधन को स्वर्णो का मात्र 25% वोट मिलेगा।।
10% स्वर्ण वोट बसपा के साथ होगा जहाँ अकेला स्वर्ण टिकट बसपा का होगा।।

इस प्रकार स्वर्णो का 65% वोट इस बार बीजेपी के साथ होगा, जो पिछली बार 40% मात्र था।।

स्वर्ण मतदाता सपा बसपा की गुलामी से मुक्ति पाने को इस बार जमकर उत्साहपूर्वक मतदान करें तो
सपा के मत प्रतिशत में 5% की जबरदस्त कमी सिर्फ स्वर्णो के विमुख होने से होगी,
जबकि मात्र स्वर्णो के अतिरिक्त समर्थन से बीजेपी के मत प्रतिशत में 7% की वृद्धि होगी।।

बसपा के मत प्रतिशत में स्वर्णो के और विमुख होने से पिछले चुनाव की अपेक्षा 2% की और कमी होगी।।।
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यूपी में गैर मुस्लिम और गैर अहीर ओबीसी मतदाता , और अति दलित मतदाता तकरीबन 30% हैं

पिछली बार सपा को 45% अतिपिछड़े अतिदलित मतदाताओ ने वोट दिया था,
कांग्रेस को भी पिछली बार 15% अति पिछड़े अति दलित मतदाताओं ने वोट दिया था,

इस प्रकार सपा कांग्रेस दोनों को पिछली बार कुल 60% वोट अतिपिछड़ा अतिदलित का मिला था,
20% बीजेपी और 20% बसपा को मिला था,

इस बार इस वर्ग का झुकाव स्पष्ट बीजेपी की ओर है,
सपा कांग्रेस ठगबंधन को इस वर्ग का अधिकतम 40% वोट मिलेगा,
बीजेपी को 40% और बसपा को 20% वोट अतिपिछड़ा और अति दलित मिलेगा।।

इस प्रकार अतिपिछड़ा और अति दलित वर्ग के झुकाव के कारण सपा कांग्रेस के मत प्रतिशत में 6% की कमी होगी,
जबकि बीजेपी के मत प्रतिशत में 6% की स्पष्ट वृद्धि होनी तय है।।
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मुस्लिम वोट-----मुस्लिम वोट यूपी में 19% हैं

पिछली बार 65% मुस्लिम सपा के साथ, 15% कांग्रेस के साथ थे, कुल 80% मुस्लिम इस गठबंधन के साथ थे,
और 20% बसपा के साथ थे

इस बार सपा कांग्रेस गठबंधन को 75% मुस्लिम वोट मिलेगा, बसपा को 20% वोट मुस्लिम का मिलेगा।।

इस प्रकार प्रदेश स्तर पर सपा कांग्रेस गठबंधन को मुस्लिम वोट में भी सपा गठबंधन को कोई विशेस लाभ नही होगा।
लेकिन मुस्लिम बीजेपी को हराने के लिए रणनीतिक मतदान करें तो बीजेपी को 20/25 सीटो पर झटका जरूर दे सकते हैं ।
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इस प्रकार राजनीती में सदैव 2 और 2 मिलकर चार नही होते, कांग्रेस के पास ऐसा कोई वोटबैंक नही जो वो गठबंधन में सपा को ट्रांसफर कर सके,जबकि बिहार में जेडीयू और आरजेडी का वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हुआ था।
बल्कि कांग्रेस अधिकतर सीटो पर स्वर्ण उम्मीदवार खड़े करके बीजेपी का वोट काट लेती थी जो अब नही होगा।।
इसलिए सपा को इस गठबंधन से कोई लाभ नही होगा,
कांग्रेस की सीटें जरूर 25 से बढ़कर 35-40 हो सकती हैं।

गठबंधन के बावजूद सपा कांग्रेस को मिलाकर पिछली बार 43% वोट मिला था,
इस बार इनके वोट प्रतिशत में गठबंधन के बावजूद 11-12% की कमी होगी और बीजेपी के मत प्रतिशत में 13% की वृद्धि होगी।।।
बसपा के मत प्रतिशत में पिछली बार से भी 2% की कमी हो सकती है।

इस प्रकार बीजेपी को 2012 में वोट मिला था 21%
इस बार बीजेपी को वोट मिलेगा 33-34%

सपा कांग्रेस इन दोनों को मिलकर 2012 में वोट मिला था 43%
इस बार गठबंधन के बावजूद इन्हें वोट मिलेगा 31-32%

बसपा को 2012 में वोट मिला था 26%
इस बार इन्हें वोट मिलेगा 24-25%

इस प्रकार सीटों का आंकड़ा यह रह सकता है

बीजेपी        135-145
सपा            105-115
कांग्रेस           25 - 35
बसपा            75 - 85
आरएलडी        2-6
अन्य                8-12

Wednesday, January 18, 2017

यूपी में प्रथम चरण के 15 जिलो में सपा गठबंधन और बीजेपी के बीच कांटे का मुकाबला


यूपी विधानसभा चुनाव में प्रथम चरण में 15 जिलों की 73 विधानसभा सीटों का आकलन-------

प्रथम चरण में जिन 15 जिलों की 75 सीटो पर मतदान होगा, उनमे मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ,हापुड़, ग़ाज़ियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, हाथरस, मथुरा, एटा, कासगंज, फीरोजाबाद शामिल हैं।।

इस पुरे गंगा यमुना के दोआब के इलाके में सभी सामाजिक वर्गों की अनुमानित जनसंख्या और उनका रुझान मेरी सूक्ष्म बुद्धि के अनुसार निम्नवत नजर आ रहा है।।।
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1----मुस्लिम आबादी तकरीबन 24%

इन 15 जिलों में मुस्लिम आबादी सर्वाधिक 24% है, शामली, मुजफ्फरनगर में करीब 40% ,मेरठ/बागपत में 32% और बाकि जगह 15% से 22% के बीच है।।

मुस्लिम मतों का रुझान इस प्रकार नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 70% मुस्लिम यानि कुल 16%
B--बसपा को 25% मुस्लिम यानि कुल 6%
C--बीजेपी को लगभग न के बराबर यानि 0.25%
D--अन्य को कुल 1.75%
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2---दलित वोट (जाटव/चर्मकार) तकरीबन 18%

दलित वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 4% यानि कुल 0.7%
B--बसपा को 90% यानि कुल 16.2%
C--बीजेपी को 5% यानि कुल 0.9%
D--अन्य को कुल 0.2%
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3--जाट वोट तकरीबन 9%

जाट वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा कांग्रेस रालोद गठबंधन(?) को 70% यानि कुल 6%
B--बसपा को 5% यानि कुल 0.45%
C--बीजेपी को 25% यानि 2.25%
D--अन्य को 0.3%
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4--ब्राह्मण वोट तकरीबन 9%

ब्राह्मण वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 20% यानि कुल 1.8%
B--बसपा को 10% यानि कुल 0.9%
C--बीजेपी को 70% यानि 6.2%
D--अन्य को 0.1%
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5--राजपूत वोट तकरीबन 8%

राजपूत वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 10% यानि 0.8%
B--बसपा को 5% यानि 0.4%
C--बीजेपी को 85% यानि 6.5%
D--अन्य को कुल 0.3%
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6--वैश्य, पंजाबी, कायस्थ, सिक्ख आदि व्यापारी वर्ग तकरीबन 5%

व्यापारी वर्ग का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 35% यानि 1.70%
B--बसपा को 5% यानि 0.25%
C--बीजेपी को 60% यानि 3%
D--अन्य को कुल 0.05%
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7---गुर्जर वोट तकरीबन 4%

गुर्जरो का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 50 % यानि 2%
B--बसपा को 20% यानि 0.8%
C--बीजेपी को 30 % यानि 1.1%
D--अन्य को कुल 0.1%
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8---अहीर वोट तकरीबन 4%

अहिरो का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 90% यानि  3.6%
B--बसपा को 2% यानि 0.08%
C--बीजेपी को 5 % यानि 0.2%
D--अन्य को कुल 0.12%
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9--लोधी वोट तकरीबन 3%

लोधी वोट का रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 10 % यानि 0.3%
B--बसपा को 10% यानि 0.3%
C--बीजेपी को 80 % यानि 2.3%
D--अन्य को कुल 0.1%
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10---त्यागी/रोड आदि अन्य किसान स्वर्ण जातियां तकरीबन 1%
इनका रुझान निम्नवत है।

A--सपा गठबंधन को 10 % यानि 0.1%
B--बसपा को 5% यानि 0.05%
C--बीजेपी को 80 % यानि 0.8%
D--अन्य को कुल 0.05%
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11--अति पिछड़ा/गैर जाटव दलित/अन्य ओबीसी वर्ग तकरीबन 15%

इनका रुझान निम्नवत नजर आ रहा है।

A--सपा गठबंधन को 20 % यानि 3.2%
B--बसपा को 10% यानि 1.5%
C--बीजेपी को 70 % यानि 10%
D--अन्य को कुल 0.3%
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इस प्रकार प्रथम चरण में 15 जिलो की 73 सीटों में मत प्रतिशत का रुझान निम्नवत नजर आया है


A--सपा गठबंधन----36.2%

B--बसपा को ---26.93%

C--बीजेपी को ---33.5%

D--अन्य को कुल 3.37%

इसे थोडा अलग अलग समाज के मतदान प्रतिशत के कम ज्यादा होने से भी जोड़कर देखा जाए तो संशोधित आंकड़ा लगभग यह रहेगा।

A--सपा गठबंधन----36 %

B--बसपा को ---28 %

C--बीजेपी को ---33 %

D--अन्य को कुल 3 %

इस प्रकार प्रथम चरण के 15 जिलो में 73 सीटों पर समाजवादी पार्टी,रालोद,कांग्रेस गठबंधन वाकई में हुआ तो इस इलाके में अहीर आबादी कम होते हुए भी सपा आश्चर्यजनक रूप से बीजेपी पर 3% वोट की बढ़त बनाए हुए है।

इसका कारण मुस्लिम मतो की सपा के पक्ष में गोलबन्दी,
जाट गूजरों को अधिक टिकट दिए जाने के बावजूद उनका बीजेपी से किनारा करना,
बीजेपी में कल्याण सिंह व् अन्य नेताओ द्वारा खराब टिकट वितरण करवाना,
नोटबन्दी से व्यापारी वर्ग में भारी नाराजगी होना,
बीजेपी द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा न दिया जाना होगा।।

हालाँकि बीजेपी अभी भी कुछ टिकटों में बदलाव करके, और जाट ,गूजरो व्यापारियो को साधकर इस कमी की भरपाई कर सकती है।।

फ़िलहाल इन 73 सीटों में सपा गठबंधन 30 से 32 सीट, बीजेपी 25 से 27 सीट, बसपा 15 से 17 सीट जीतती नजर आ रही है।

दूसरे चरण में मुकाबला रुहेलखण्ड में होगा जहाँ मुस्लिम वोट 35% से 52% के बीच हैं और अहीर मतदाता भी अधिक हैं,
यहाँ भी सपा का पलड़ा भारी रहने के आसार होंगे, पर ध्रुवीकरण से बीजेपी भी मुकाबले में होगी।।

(नोट---प्रथम चरण की 73 सीटो के अनुमान में सपा कांग्रेस रालोद गठबंधन मानकर आकलन किया गया है, रालोद इस गठबंधन से दूर हुआ तो प्रथम चरण में बीजेपी बढ़त पर होगी

अगर रालोद ,सपा गठबंधन में शामिल नही हुआ तो जाट वोट जो 6% सपा गठबंधन को मिलते वो बीजेपी और रालोद में बंट जाएंगे,
इस दशा में बीजेपी को इस प्रथम चरण की सीटो में लगभग 35% मत प्राप्त होंगे,
सपा कांग्रेस गठबंधन 30% मत प्राप्त करके दूसरे स्थान पर होगा, वहीँ 27% मत पाकर बसपा तीसरे स्थान पर रहेगी।

इस दशा में इन15 जिलो की 73 सीटों पर बीजेपी को 40-42 सीट , सपा गठबंधन को 18-20 सीट , बसपा को 10-12 सीट और रालोद व् अन्य को 2-4 सीट सीट मिल सकती है।।

Monday, January 9, 2017

क्या विधानसभा चुनाव में बीजेपी द्वारा ठगा जाएगा सहारनपुर का राजपूत समाज??

क्या सहारनपुर के राजपूत समाज के साथ धोखा होगा??--------

मित्रों सहारनपुर की देवबन्द विधानसभा पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूतों का सबसे बड़ा गढ़ रहा है, अधिकतर राजपूत ही यहाँ से विधायक रहे हैं और स्वर्गीय ठाकुर फूलसिंह जी और स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह राणा यहाँ से जीतकर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं।

परिसीमन में इस सीट के 20 हजार राजपूत वोट समीप की गुर्जर बाहुल्य गंगोह सीट में जुड़ गए, जिससे देवबन्द में अब राजपूत वोट घटकर 40 हजार रह गए हैं और गंगोह में राजपूत वोट 25 हजार हो गए हैं।।

देवबन्द सीट पर त्यागी वोट 18 हजार, गुर्जर वोट 22 हजार और जाट वोट 5 हजार हैं जबकि 90 हजार मुस्लिम और 60 हजार दलित भी हैं

पिछली बार देवबन्द सीट पर समाजवादी पार्टी के स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह राणा जी जीतकर मंत्री बने थे, इस बार अभी तक उनकी पत्नी श्रीमती मीना राणा को सपा ने टिकट दिया था, पर उपचुनाव में इमरान मसूद के प्रत्याशी माविया अली मामूली अंतर से जीत गए थे क्योंकि राजपूत वोट बीजेपी और सपा के उम्मीदवारों के बीच बंट गए थे और वोटिंग प्रतिशत भी हिन्दू गाँवो में कम हुआ था।।

अब इस सीट पर राजपूतो के विरुद्ध बीजेपी और सपा दोनों में साजिश होने के समाचार मिल रहे हैं

सुना है इमरान मसूद का विधायक माविया अली लखनऊ में अखिलेश यादव गुट के सम्पर्क में है और समाजवादी पार्टी से टिकट मिलने का उसे आश्वासन भी मिल गया है!!!!
बसपा ने भी इस सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार माजिद को टिकट दिया है ,और कांग्रेस अलग लडी तो वो भी किसी मुस्लिम को ही टिकट देगी,
ऐसे में उपचुनाव की तरह ही बीजेपी किसी राजपूत उम्मीदवार को टिकट देती है तो वो आसानी से सीट निकाल लेगा!!!!

लेकिन इस हालात में बीजेपी में राजपूत विरोधी सक्रिय हो गए हैं और सपा कांग्रेस बसपा तीनो के मुस्लिम उम्मीदवार होने के कारण राजपूतो की लाचारगी का फायदा उठाने के लिए अब देवबन्द सीट से गैर राजपूत को बीजेपी टिकट देने के मूड में है और मात्र 18 हजार वोट वाला त्यागी समाज व् 4 हजार वोट वाले सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल शर्मा के भाई राहुल भी मौके का लाभ उठाने के चक्कर में हैं

यही नही बसपा सरकार 2007-2012 में पुलिस के दम पर राजपूतो का उत्पीड़न करने वाला घोर राजपूत विरोधी पूर्व बसपा विधायक मनोज चौधरी गुज्जर भी अब बीजेपी में शामिल होकर उन्ही राजपूतो के वोट का ख्वाब देख रहा है जिनका उसने बसपा सरकार में दमन करने का प्रयास किया था!!!!!

इस गुज्जर नेता की वर्ष 2009 में किसी गांव में राजपूत विरोधी टिप्पणी के कारण राजपूतो ने जमकर धुनाई भी कर दी थी,
ऐसा घोर राजपूत विरोधी नेता भी राजपूतो की हिंदूवादी सोच का लाभ उठाकर राजपूत बाहुल्य देवबन्द विधानसभा सीट से विधायक बनने का ख्वाब देख रहा है!!!!!!!!
बराबर की गंगोह विधानसभा से भी बीजेपी गुज्जर उम्मीदवार प्रदीप चौधरी को टिकट दे रही है,

और राजपूतो को मुर्ख बनाने के लिए देवबन्द की बजाय एक ऐसी सीट सहारनपुर देहात से टिकट दिया जा रहा है जहाँ मोदी लहर में भी कुछ दलित वोट भी पाने के बावजूद बीजेपी 2014 में पिछड़ गयी थी!!!!!
उस सीट पर कोई भी बीजेपी उम्मीदवार चुनाव नही जीत सकता,
पर राजपूतो को मुर्ख बनाने के लिए देवबन्द की बजाय सहारनपुर देहात जैसी बेहद कमजोर सीट से टिकट दिया जा सकता है!!!!!!!

क्या सहारनपुर का राजपूत समाज अपने साथ होने वाले इस धोखे को चुप रहकर बर्दाश्त करे या कोई अलग रणनीति पर विचार करे????